International Society for Krishna Consciousness

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आर्थर ऐश का दृष्टिकोण
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आर्थर ऐश का दृष्टिकोण

एक समय की बात है, आर्थर ऐश (Arthur Ashe) दुनिया के बेहद प्रसिद्ध और महान टेनिस खिलाड़ी थे। उन्होंने प्रतिष्ठित विंबलडन चैंपियनशिप जीती थी और वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय एथलीटों में से एक थे।

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एक समय की बात है, आर्थर ऐश (Arthur Ashe) दुनिया के बेहद प्रसिद्ध और महान टेनिस खिलाड़ी थे। उन्होंने प्रतिष्ठित विंबलडन चैंपियनशिप जीती थी और वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय एथलीटों में से एक थे। एक इंटरव्यू के दौरान, एक पत्रकार ने उनसे बहुत ही संवेदनशील सवाल पूछा— “सर, आपको कैसा महसूस होता है? आपने इतनी सफल और शानदार ज़िंदगी जी, और आज आपको HIV/AIDS जैसी गंभीर बीमारी हो गई।” आर्थर ऐश ने बहुत शांत और गंभीर भाव से जवाब दिया। उन्होंने कहा— “दुनिया में हजारों-लाखों लोग टेनिस का रैकेट खरीदते हैं। कोई शौक से खरीदता है, कोई गर्मियों की छुट्टियों में खेलने के लिए, तो कोई किसी को गिफ्ट देने के लिए। लेकिन उन लाखों लोगों में से कितने लोग ऐसे हैं जो आगे चलकर उस रैकेट का वास्तव में सही उपयोग कर पाते हैं?” फिर उन्होंने अपनी पूरी यात्रा समझाते हुए कहा— “उनमें से कुछ लोग नियमित ट्रेनिंग लेते हैं। उनमें से कुछ ही जिला स्तर तक पहुँचते हैं। फिर बहुत कम राज्य स्तर पर और कुछ राष्ट्रीय स्तर पर चुने जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों में से भी शायद मुट्ठी भर खिलाड़ी ही अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच पाते हैं। फिर उन अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों में से कुछ ही विंबलडन जैसे बड़े टूर्नामेंट के लिए चुने जाते हैं। वहाँ भी खिलाड़ी कम होते जाते हैं—क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल और अंत में केवल दो खिलाड़ी फाइनल में पहुँचते हैं। और उन दो में से केवल एक व्यक्ति के हाथ में विंबलडन कप आता है। और वह कप मुझे मिला।” इसके बाद उन्होंने जीवन का सबसे गहरा सत्य बताते हुए कहा— “तो जब मुझे विंबलडन कप मिला, तब मैंने भगवान से यह नहीं पूछा कि ‘Why me?’ (मैं ही क्यों?) — भगवान ने मुझे ही दुनिया के करोड़ों लोगों में से यह अवसर क्यों दिया? तो आज जब मुझे यह बीमारी हुई है, तब मैं भगवान से यह कैसे पूछ सकता हूँ—‘Why me?’ इतने सारे लोग हैं दुनिया में, फिर भी भगवान ने मुझे यह सौभाग्य दिया कि मैं विंबलडन कप जीतूँ। मैंने तब भगवान से नहीं पूछा कि मुझे ही क्यों चुना। तो आज भी मैं यह नहीं पूछूँगा कि मुझे ही यह बीमारी क्यों मिली। भगवान ने जो परिस्थिति दी है, मैं कृतज्ञता के साथ उसका सामना करूँगा और इससे लड़ूँगा।”

श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य संदेश (10.14.8) आर्थर ऐश का यही दृष्टिकोण हज़ारों साल पहले श्रीमद्भागवत में ब्रह्मा जी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए बेहद सुंदर श्लोक के माध्यम से समझाया गया है: "तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् । हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥" जो व्यक्ति अपने जीवन में आने वाले दुखों और कठिन परिस्थितियों को भी भगवान की विशेष अनुकम्पा (कृपा) मानकर स्वीकार करता है, बिना किसी शिकायत के अपने प्रारब्ध को भोगता है, और सुख हो या दुख—हर हाल में मन, वचनों तथा शरीर से भगवान के प्रति कृतज्ञ (Thankful) रहकर उन्हें नमन करता है, वह सहज ही ईश्वर के परम पद (मुक्ति) का अधिकारी बन जाता है। जीवन में परिस्थितियां बदलती रहेंगी—आज जीत है, तो कल हार भी हो सकती है; आज स्वास्थ्य है, तो कल बीमारी भी आ सकती है। आर्थर ऐश की तरह, हमें हर परिस्थिति में शांत रहकर, शिकायत किए बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।

निष्कर्ष: सुख में अहंकार से बचना और दुख में धैर्य न खोना ही जीवन की सबसे बड़ी जीत है।
हरे कृष्ण
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