एक बार महर्षि पराशर अपने शिष्यों के साथ वनमार्ग से जा रहे थे। तभी वहाँ एक शिकारी आया और उनसे बोला— “मुनिवर! आज मेरे साथ एक अद्भुत घटना घटी है।” पराशर मुनि ने पूछा— “क्या हुआ?”
शिकारी बोला— “मैं एक शिकारी हूँ। प्रतिदिन शिकार करता हूँ और अनेक पशुओं का वध करता हूँ। परंतु आज जब मैं एक खरगोश पर बाण चलाने ही वाला था, तब वह भयभीत होकर भागा नहीं। वह मेरे पास आया, मेरे चारों ओर घूमने लगा, मानो परिक्रमा कर रहा हो। फिर उसने अपना सिर मेरे चरणों में झुका दिया।
उसकी यह शरणागति देखकर मेरा हृदय पिघल गया। मैं उस पर बाण नहीं चला सका। मैंने उसे प्रेम से सहलाया और छोड़ दिया।” यह सुनते ही महर्षि पराशर मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
शिष्यों ने उनके ऊपर जल छिड़का, उन्हें होश में लाया और पूछा— “गुरुदेव! आप बेहोश क्यों हो गए?” पराशर मुनि की आँखों से आँसू बह रहे थे।
वे बोले— “यह शिकारी कितना क्रूर है! प्रतिदिन पशुओं का वध करता है। फिर भी जब एक छोटा-सा खरगोश उसकी शरण में आया, तो वह उसे मार नहीं सका। उसकी शरणागति ने शिकारी के कठोर हृदय को भी पिघला दिया।

फिर भगवान तो स्वयं भगवद्गीता में कहते हैं— सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
‘सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा; डरो मत।
जब एक क्रूर शिकारी शरणागत की रक्षा कर सकता है, तो क्या भगवान—जो अनंत करुणामय, दयालु और प्रेमस्वरूप हैं—अपनी शरण में आए हुए जीव की रक्षा नहीं करेंगे? क्या वे उसके पापों को क्षमा नहीं करेंगे?”
मुनि आगे बोले— “मुझे यह सोचकर पीड़ा हुई कि एक पशु ने तो शरण लेना सीख लिया, पर हम मनुष्य होकर भी भगवान की शरण में नहीं जा पा रहे हैं।
एक ओर मनुष्य की मूर्खता है, दूसरी ओर भगवान की असीम करुणा। यही विचार सहन न कर पाने के कारण मैं मूर्छित हो गया।”
श्रीमद्भागवतम् में भी हम भगवान की करुणा की महिमा सुनते हैं -
अहो बकीयं स्तन-काल-कूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्य्-उचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥
“अहो! वह बकासुर की बहन पूतना कितनी दुष्टा थी। उसने अपने स्तनों पर विष लगाकर बालक कृष्ण को मारने का प्रयास किया, फिर भी भगवान ने उसे अपनी माता के समान पद प्रदान किया। तब बताइए, भगवान से अधिक दयालु और किसकी शरण में जाया जाए?”
शिक्षा -हमें भगवान श्रीकृष्ण की शरण लेने में विलंब नहीं करना चाहिए। शरणागति ही वास्तव में भक्ति का हृदय है। जब जीव अहंकार, भय और स्वार्थ छोड़कर यह स्वीकार कर लेता है— हे कृष्ण! मैं आपका हूँ, आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। तब भगवान उसकी रक्षा अवश्य करते हैं ।
