International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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अदृश्य पुल और रक्षा करने वाले भगवान
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अदृश्य पुल और रक्षा करने वाले भगवान

एक बार एक गाँव में भगवान का एक परम भक्त रहता था। वह दिन-रात भगवान की भक्ति में लीन रहता था और उसका यह दृढ़ विश्वास था कि सुख हो या दुख, भगवान हमेशा उसका हाथ पकड़कर रखते हैं।

भाषा:

एक बार एक गाँव में भगवान का एक परम भक्त रहता था। वह दिन-रात भगवान की भक्ति में लीन रहता था और उसका यह दृढ़ विश्वास था कि सुख हो या दुख, भगवान हमेशा उसका हाथ पकड़कर रखते हैं। एक बार उसे किसी आवश्यक कार्य से दूसरे राज्य की यात्रा पर जाना पड़ा। रास्ते में एक अत्यंत भयानक, घनी और अंधेरी घाटी थी, जिसके नीचे एक बहुत ही गहरी और खौफनाक खाई थी। उस खाई में उफनती हुई नदी बह रही थी और नुकीले पत्थर थे। उस गहरी खाई को पार करने के लिए केवल लकड़ी का एक बहुत ही पुराना और जर्जर पुल (Suspension Bridge) बना हुआ था। जब वह भक्त उस पुल के पास पहुँचा, तो अचानक मौसम बहुत खराब हो गया। मूसलाधार बारिश होने लगी, भयंकर तूफ़ान चलने लगा और चारों ओर घुप्प अंधेरा छा गया। पुल हवा में ज़ोर-ज़ोर से हिल रहा था और उसकी लकड़ियाँ एक-एक करके टूट कर नीचे खाई में गिर रही थीं। भक्त बुरी तरह घबरा गया। उसने कांपते हुए पैरों से पुल पर कदम रखा। जैसे ही वह आगे बढ़ा, पुल का संतुलन बिगड़ने लगा। वह रोने लगा और चिल्लाकर भगवान से प्रार्थना करने लगा, "हे कृष्ण! हे प्रभु! रक्षा करो! मुझे इस पार से उस पार पहुँचा दो! तुम कहाँ हो प्रभु? मैं तुम्हारा इतना बड़ा भक्त हूँ, पर आज इस संकट में तुम मुझे अकेले छोड़कर कहाँ चले गए? तुम मेरी मदद के लिए सामने क्यों नहीं आते?" उसे कोई चमत्कार होता हुआ नहीं दिखा। वह रोता-बिलखता, डर के मारे कांपता हुआ, किसी तरह रेंगते-रेंगते अधमरी स्थिति में उस खतरनाक पुल को पार कर के दूसरी तरफ सुरक्षित पहुँच गया। जैसे ही उसने सुरक्षित ज़मीन पर पैर रखा, वह हांफते हुए ज़मीन पर बैठ गया। वह भगवान से बहुत निराश और उदास था। उसने रोते हुए आसमान की तरफ देखा और उलाहना देते हुए कहा, "हे नाथ! मैं तो सोचता था कि आप हर पल मेरे साथ चलते हैं। लेकिन आज जब मेरी जान दांव पर लगी थी, जब मैं मौत के मुँह में था, तब आप मेरे साथ नहीं थे। आपने मुझे इस भयानक तूफ़ान में अकेला छोड़ दिया!" तभी उस घने अंधेरे और गड़गड़ाहट के बीच एक आकाशवाणी हुई। भगवान की अत्यंत प्रेममयी और गंभीर आवाज़ गूंजी: "मेरे प्रिय बच्चे! तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि मैं तुम्हारे साथ नहीं था? तुम अपनी आँखों से केवल उस हिलते हुए पुल को देख रहे थे, लेकिन तुम यह नहीं देख पा रहे थे कि मैं तो पुल के दूसरी तरफ (खाई के नीचे) खड़ा होकर अपने दोनों हाथों से उस टूटते हुए पुल को पूरी ताकत से थामे हुए था! अगर मैं एक क्षण के लिए भी उस पुल को छोड़ देता, तो तुम कब के उस खाई में समा चुके होते। मैं तुम्हारे साथ पीछे नहीं चल रहा था, क्योंकि मुझे आगे बढ़कर तुम्हें बचाने के लिए उस पुल को संभालना था।" यह सुनते ही भक्त के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह फूट-फूट कर रोने लगा और भगवान के चरणों में गिर गया। उसे समझ आ गया कि जिसे वह भगवान का अकेला छोड़ देना समझ रहा था, वह वास्तव में भगवान की सबसे बड़ी सुरक्षा थी।

कहानी का आध्यात्मिक संदेश

यह कहानी हमें हमारे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीख देती है: १.हम भगवान के प्लान को नहीं समझ सकते (God's Plan vs Our Logic): जब हमारे जीवन में बीमारियाँ, असफलताएँ, आर्थिक तंगी या प्रियजनों का वियोग आता है, तो हम तुरंत भगवान पर संदेह करने लगते हैं। हम सोचते हैं, "मैंने इतनी पूजा की, फिर भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?" हम यह भूल जाते हैं कि जैसे वह भक्त केवल हिलती हुई लकड़ी देख रहा था, वैसे ही हम केवल अपने जीवन का तात्कालिक दुख देख रहे हैं। हम परदे के पीछे चल रही भगवान की बड़ी योजना (Master Plan) को नहीं देख सकते। २.अदृश्य रक्षा (Invisible Protection): भगवद्गीता (9.22) में भगवान श्री कृष्ण प्रतिज्ञा करते हैं—"योगक्षेमं वहाम्यहम्" अर्थात् "जो मेरे अनन्य भक्त हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ हैं उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो उनके पास है, उसकी मैं रक्षा करता हूँ।" भगवान हमेशा हमारे संकटों को झेलने के लिए हमसे आगे खड़े होते हैं। कई बार वे हमें बड़ी दुर्घटना से बचाने के लिए छोटी चोट दे देते हैं, जिसे हम दुख मान बैठते हैं। ३.विश्वास की परीक्षा: जब जीवन रूपी पुल हिलने लगे, तो भगवान से शिकायत करने के बजाय अपने विश्वास को और मजबूत करना चाहिए। यदि हम आज जीवित हैं और हर संकट से बाहर निकल आते हैं, तो यह हमारी ताकत नहीं, बल्कि परदे के पीछे से कृष्ण द्वारा हमारे 'पुल' को थामे रखने का परिणाम है।

श्रील प्रभुपाद कहते थे कि भगवान पर विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कभी तूफ़ान नहीं आएगा। इसका अर्थ यह है कि तूफ़ान के बीच भी आपका यह विश्वास अडिग रहेगा कि नाव का पतवार (कंट्रोल) साक्षात कृष्ण के हाथों में है। वे हमें कभी डूबने नहीं देंगे।
हरे कृष्ण
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