एक समय की बात है, जापान के एक स्कूल में एक शिक्षिका ने अपने छात्रों को एक अनोखा अभ्यास दिया। उन्होंने पूछना शुरू किया, "तुम्हारी कक्षा में तुम्हें कौन पसंद नहीं है? अपनी उँगलियों पर गिनो।" बच्चे पहले तो झिझके लेकिन जल्द ही गिनने लगे। एक ने कहा, "मुझे यह लड़का पसंद नहीं है।" दूसरे ने कहा, "वह लड़की हमेशा मुझे परेशान करती है।" संख्या अलग-अलग थी - किसी को दो सहपाठी पसंद नहीं थे, तो किसी को छह या सात। फिर शिक्षिका ने एक आश्चर्यजनक निर्देश दिया। "तुम जितने लोगों को नापसंद करते हो, उतने ही आलू उबालो और कल उन्हें एक प्लास्टिक की थैली में स्कूल लेकर आओ।" अगले दिन, बच्चे अपनी थैलियाँ लेकर आए। एक बच्चे के पास सिर्फ दो आलू थे, जबकि दूसरे के पास सात आलू थे, उसकी थैली लगभग फटने वाली थी। शिक्षिका मुस्कुराई और बोली, "अब चुनौती यह है: अपनी थैली हर जगह अपने साथ लेकर जाओ। इसे कहीं भी मत रखो, चाहे सोते समय हो या शौचालय जाते समय भी। देखते हैं तुम कैसे संभालते हो।" शुरू में बच्चों को यह मजेदार लगा, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, भारी थैलियाँ मुसीबत बन गईं। आलू सड़ने लगे और उनमें से बदबू आने लगी। जिस बच्चे के पास एक या दो आलू थे, वह बेहतर तरीके से संभाल रहा था, लेकिन जिनके पास ज्यादा आलू थे वे दुखी हो गए। पाँचवें दिन, बच्चे गिड़गिड़ाए, "मैडम, हम अब यह नहीं कर सकते। बदबू असहनीय है और वजन बहुत ज्यादा है!" शिक्षिका ने सिर हिलाया और धीरे से समझाया, "ये आलू उस गुस्से और द्वेष का प्रतीक हैं जो तुम अपने मन में रखते हो। जैसे यह थैली बोझ बन गई, वैसे ही नकारात्मक भावनाओं को पकड़े रहने से तुम्हारा दिल और मन बोझिल हो जाता है। यह भारी, अप्रिय और हानिकारक है। इसे ढोने के बजाय, इसे जाने क्यों नहीं देते? क्षमा करो, भूल जाओ, और खुद को इस अनावश्यक बोझ से मुक्त करो।" बच्चों ने ध्यान से सुना और उनकी बातों में छिपी बुद्धिमत्ता को समझा। उन्होंने अपने सहपाठियों को माफ करने और दयालुता पर ध्यान केंद्रित करने का संकल्प लिया।
शिक्षा गुस्से या द्वेष को पकड़े रहने से केवल हमें ही नुकसान होता है। क्षमा ही आंतरिक शांति और खुशी की कुंजी है। नकारात्मकता को छोड़ने से हमारा मन और आत्मा स्वच्छ हो जाते हैं, जिससे हम आगे बढ़ पाते हैं।
