International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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राजकुमारी का हार और उलटा वृक्ष
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राजकुमारी का हार और उलटा वृक्ष

सच्चे सुख की खोज

भाषा:

एक बार की बात है, किसी राज्य के राजा ने अपनी प्रिय राजकुमारी को एक अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य हीरों का हार भेंट किया। वह हार राजकुमारी को प्राणों से भी प्यारा था। एक दिन उपवन में टहलते समय वह हार अचानक कहीं खो गया। राजकुमारी के दुःखी होने पर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवा दी कि जो भी उस हार को ढूंढकर लाएगा, उसे भारी स्वर्ण मुद्राओं का पुरस्कार दिया जाएगा। इनाम के लालच में नगर का हर व्यक्ति उस हार की खोज में लग गया। एक दिन एक व्यक्ति गंदे नाले के किनारे से गुजर रहा था। अचानक उसकी नजर नाले के बदबूदार और काले पानी पर पड़ी, जहाँ हीरों का वह हार चमक रहा था। वह बिना सोचे-समझे तुरंत उस गंदे पानी में कूद पड़ा। उसने हार को मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हाथ में सिर्फ कीचड़ और गंदगी आई। बाहर आकर उसने पानी में फिर देखा, तो हार वहीं चमकता दिखाई दिया। उसने दोबारा, तिबारा गोता लगाया, लेकिन जितनी बार वह हाथ बढ़ाता, पानी हिल जाता और हार गायब हो जाता। कुछ ही देर में वह व्यक्ति सिर से पैर तक गंदगी में लथपथ हो गया और थक-हारकर किनारे बैठ गया। तभी वहाँ से एक प्रबुद्ध साधु गुजरे। उन्होंने उसकी यह दयनीय दशा देखकर पूछा, "वत्स! तुम इस गंदे नाले में क्या ढूंढ रहे हो?" उस व्यक्ति ने हाँफते हुए कहा, "महाराज! राजकुमारी का बहुमूल्य हार इस पानी में पड़ा है। मैं इसे पकड़ने की इतनी कोशिश कर रहा हूँ, पर हर बार मेरे हाथ केवल कीचड़ ही लगता है।" साधु मुस्कुराए और बोले, "मूर्ख! नीचे गंदे पानी में मत देख, अपनी नजर ज़रा ऊपर पेड़ की डाल की तरफ उठा।" जैसे ही उस व्यक्ति ने ऊपर देखा, वह स्तब्ध रह गया। असली हीरों का हार पेड़ की एक डाल पर सुरक्षित अटका हुआ था। पानी में जो दिख रहा था, वह तो केवल उस असली हार की उल्टी परछाईं (प्रतिबिंब) थी। वह छाया को सच मानकर गंदे नाले में गोते लगा रहा था। श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य संदेश (अध्याय 15, श्लोक 1) भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में इस संपूर्ण भौतिक संसार की तुलना इसी प्रकार के एक प्रतिबिंबित और उलटे वृक्ष से करते हैं: "ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥" परम पुरुषोत्तम भगवान ने कहा— कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ (बरगद/पीपल) का वृक्ष है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर (आध्यात्मिक जगत में) हैं और शाखाएं नीचे की ओर (भौतिक जगत में) फैली हैं, तथा जिसके पत्ते वैदिक स्तोत्र हैं। जो इस वृक्ष के रहस्य को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है। जिस प्रकार जलाशय के किनारे खड़े पेड़ की परछाईं पानी में उल्टी (जड़ें ऊपर और डालियाँ नीचे) दिखाई देती है, ठीक उसी तरह यह भौतिक संसार वास्तविक आध्यात्मिक जगत का केवल एक विकृत प्रतिबिंब है। परछाईं में कभी असली फल या रस नहीं मिल सकता। सच्चा सुख कहाँ है?: संसार का हर जीव वास्तव में प्रेम, आनंद और शांति (हार) की तलाश में है। लेकिन हम उसे इस भौतिक संसार रूपी गंदे नाले (धन, वासना, क्षणभंगुर रिश्तों) में खोज रहे हैं, जहाँ अंत में केवल दुःख, निराशा और कर्म-बंधन की कीचड़ ही हाथ लगती है। जैसे साधु ने उस व्यक्ति की दृष्टि नीचे नाले से हटाकर ऊपर की ओर कराई, वैसे ही एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु हमारी दृष्टि इस संसार की भौतिक परछाईं से विरक्त कराकर परम स्रोत—भगवान श्रीकृष्ण और उनके शाश्वत आध्यात्मिक धाम—की ओर मोड़ते हैं, जहाँ वास्तविक और असीम आनंद स्थित है।

निष्कर्ष: छाया (परछाईं) के पीछे भागना बंद करके, वास्तविकता (ईश्वर) को पहचानना ही मानव जीवन की असली सफलता है।
हरे कृष्ण
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