एक बार एक सरल और विनम्र वैष्णव संत भारत की एक भीड़भरी रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे। उनके पास एक छोटी-सी कपड़े की थैली थी, जिसमें उनकी हाल की यात्रा में प्राप्त कुछ दानराशि थी। यह धन भगवान के भक्तों की सेवा के लिए एकत्र किया गया था। संत खिड़की के पास शांत भाव से बैठे थे। उनके मुख पर गहरी संतुष्टि थी और वे निरंतर भगवान के पवित्र नामों का जप कर रहे थे। रात हुई और यात्री गहरी नींद में सो गए। उसी समय एक चालाक चोर दबे पाँव डिब्बे में आया। उसकी नजर संत की थैली पर पड़ी। उसने चुपचाप थैली उठाई और अँधेरे में गायब हो गया। अगली सुबह चोरी का पता चला। कुछ यात्रियों ने संत के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, तो कुछ चोर को अधर्मी कहकर उसकी निंदा करने लगे। लेकिन संत… केवल मुस्कुराए। उन्होंने हाथ जोड़कर शांत स्वर में कहा— “मैं उसका भी धन्यवाद करता हूँ। उसने मेरे धन के साथ मेरी चिंता भी ले ली। वह धन कभी मेरा था ही नहीं—वह तो भगवान का था। अब भगवान ने किसी और सेवक को उसे ले जाने के लिए चुना है।” परिवर्तन:- वह चोर दूर नहीं गया था। उसने संत की बातें सुन लीं। उसे क्रोध, गालियाँ या किसी प्रकार के हंगामे की अपेक्षा थी। लेकिन उसके कानों में तो करुणा और क्षमा के शब्द पड़े। उसका हृदय काँप उठा। उसने मन में सोचा— “यह कैसा मनुष्य है?” उस रात चोर वापस लौटा। लज्जा और पश्चात्ताप से काँपते हुए उसने वह थैली संत के चरणों में रख दी। उसने धीमे स्वर में कहा— “मैं इसके योग्य नहीं हूँ।” संत फिर मुस्कुराए और बोले— “अब तुम पहले से भी अधिक योग्य हो। तुमने वह लौटा दिया जो कभी तुम्हारा था ही नहीं। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि तुम्हारे भीतर तुम्हारी अंतरात्मा जाग उठी है—और यह सोने से भी अधिक दुर्लभ है।”
सीख और चिंतन:-
१ अनासक्ति:- संत पुण्य कार्य के लिए एकत्र किए गए धन से भी आसक्त नहीं थे। उनका वास्तविक सहारा धन नहीं, बल्कि भगवान थे। २ निंदा से श्रेष्ठ करुणा:- संत ने चोर को दंडित या अपमानित नहीं किया। उनकी करुणा ने उसके भीतर सोई हुई अंतरात्मा को जगा दिया। ३ वास्तविक आध्यात्मिक संपत्ति:- सबसे बड़ा खजाना वह नहीं है जो हम अपनी थैली में लेकर चलते हैं, बल्कि वह है जो हम अपने हृदय में लेकर चलते हैं—कृष्ण का पवित्र नाम, भगवान पर विश्वास और क्षमा करने की भावना। श्रीमद्भागवत 10.14.8 में इसी भाव को व्यक्त किया गया है— “तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥” अर्थात् जो भक्त अपने जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों को भगवान की कृपा के रूप में स्वीकार करता है, अपने पूर्व कर्मों के फल को सहन करता हुआ भगवान को नमस्कार करता रहता है और अपने मन, वाणी तथा शरीर से उनकी सेवा करता है—वह मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। संत की मुस्कान हमें याद दिलाती है—परिस्थितियाँ हमारे हाथ में नहीं होतीं, लेकिन उन परिस्थितियों में हमारी चेतना कैसी रहेगी, यह हमारे हाथ में है।
