International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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गोपाल और दुर्गी माँ
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गोपाल और दुर्गी माँ

बंगाल के एक छोटे से गाँव में एक सरल और धर्मपरायण विधवा रहती थीं, जिन्हें सब प्यार से दुर्गी माँ कहते थे। सांसारिक धन के नाम पर उनके पास कुछ न था, लेकिन विश्वास की वह असीम धनी थीं।

भाषा:

​भक्त का परिचय:- ​बंगाल के एक छोटे से गाँव में एक सरल और धर्मपरायण विधवा रहती थीं, जिन्हें सब प्यार से दुर्गी माँ कहते थे। सांसारिक धन के नाम पर उनके पास कुछ न था, लेकिन विश्वास की वह असीम धनी थीं। उनका पूरा जीवन उनके गृह-विग्रह ‘श्री गोपाल’ के इर्द-गिर्द घूमता था—बाल कृष्ण का एक छोटा-सा स्वरूप, जो उन्हें अपने पूर्वजों से मिला था। ​वह गोपाल को केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि अपनी कोख से जन्मा बालक मानती थीं। हर दिन वह उन्हें नहलातीं, माखन-मिश्री खिलातीं, लोरियाँ गाकर सुलातीं और नटखटपन करने पर लाड़ से डांटती भी थीं। गाँव वाले अक्सर मुस्कुराते हुए कहते, “दुर्गी माँ अपने गोपाल के प्रेम में सचमुच बावरी हो चुकी हैं।” ​लेकिन वह किसी की परवाह नहीं करती थीं। उनके लिए गोपाल वैसे ही जीवित थे, जैसे कोई भी नन्हा बालक। ​सेवा और समर्पण का जीवन:- उनके ​साधन बहुत सीमित थे, फिर भी दुर्गी माँ अपने प्रभु के दैनिक भोग में कभी कोई कमी नहीं आने देती थीं। वह भिक्षा माँगतीं या खेतों में मजदूरी करतीं, ताकि अपने प्यारे लल्ला के लिए थोड़ा दूध, चावल और माखन जुटा सकें। वह अक्सर कहतीं, “मेरा गोपाल कभी भूखा नहीं रहना चाहिए। ​रात के समय वह वेदी के सामने बैठ जातीं और धीमी आवाज में तब तक भजन गाती रहतीं, जब तक कि उन्हें नींद न आ जाती। उनकी झोपड़ी खाली थी, तन पर फटे-पुराने वस्त्र थे, लेकिन उनका हृदय वात्सल्य रस से छलकता रहता था। एक वर्ष उस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा। फसलें सूख गईं, अन्न का एक-एक दाना दुर्लभ हो गया और चारों ओर भूख का हाहाकार मच गया। दुर्गी माँ को अपने लिए कुछ खाने को न मिला, फिर भी वह गोपाल के लिए थाली सजाती रहीं। उनके सामने एक खाली थाली रखकर वह रो पड़ीं, “ओ मेरे प्यारे लल्ला, अपनी इस माँ को क्षमा कर दे! आज तेरे लिए परोसने को मेरे पास कुछ भी नहीं है।” उनकी आँखों से आँसुओं की ऐसी अविरल धारा बही कि वह खाली थाली प्रेम के अश्रुओं से भर गई| ​प्रभु का आदान प्रदान:- ​उसी रात दुर्गी माँ को अपनी कुटिया के द्वार पर एक हल्की-सी दस्तक सुनाई दी। जब उन्होंने दरवाज़ा खोला, तो सामने एक अत्यंत सुंदर ग्वाल-बालक खड़ा था। उसके मुख पर मनमोहक मुस्कान थी और हाथों में दूध की मटकी व ताजे भोजन की टोकरी। बालक ने कहा, “माँ! रास्ते में कुछ राहगीरों ने मुझे यह दिया था, लेकिन मेरा पेट तो भर चुका है। तुम इसे अपने लिए रख लो।” ​दुर्गी माँ विस्मय से उस बालक को निहारती रह गईं। उसका साँवला-सलोना रूप, घुंघराले बाल, मस्तक पर मोरपंख... सब कुछ अत्यंत जाना-पहचाना लग रहा था। इससे पहले कि वह कुछ बोल पातीं, बालक ने वह भोजन चुपचाप वेदी पर रख दिया, माँ की ओर अपार स्नेह से देखा और पलक झपकते ही अंतर्ध्यान हो गया। भाव-विभोर होकर दुर्गी माँ भूमि पर गिर पड़ीं और बिलख-बिलख कर रोने लगीं, “हे गोपाल! तुम अपनी माँ को भोजन कराने स्वयं आ गए!” ​उस रात के बाद से, उनकी कुटिया में हमेशा अन्न रहने लगा। किसी को नहीं पता था कि वह कहाँ से आता था। बाहर अकाल का तांडव जारी था, लेकिन उस छोटी-सी झोपड़ी के भीतर, उनका गोपाल फिर कभी भूखा नहीं रहा। ​अद्भुत चमत्कार:- ​जब अकाल समाप्त हुआ, तो गाँव वाले उनकी कुटिया में पहुँचे। वे यह देखकर हैरान रह गए कि दुर्गी माँ पहले से भी अधिक स्वस्थ और प्रसन्न दिख रही थीं। ​उन्होंने पूछा, “माँ, आप इस भीषण अकाल में कैसे बची रहीं? आपके पास तो कुछ भी नहीं था।” वह मंद-मंद मुस्कुराईं और बोलीं, “जब एक माँ की देखभाल उसका अपना लल्ला करने लगे, तो फिर उसे भला और क्या चाहिए? मेरे गोपाल ने मुझे अपने हाथों से खिलाया है।” ​कई लोग हँस पड़े, उन्हें लगा कि यह केवल भावुकता की बातें हैं। लेकिन कुछ निष्ठावान भक्तों को समझ आ गया कि भगवान ने साक्षात प्रकट होकर अपने अनन्य प्रेम का परिचय दिया था। उनके देहत्याग के बाद भी, भक्तों को उनकी कुटिया के आसपास एक दिव्य उपस्थिति का अनुभव होता था। आगे चलकर वह स्थान एक पावन तीर्थ बन गया, जहाँ लोग दुर्गी माँ जैसा अटूट विश्वास पाने की प्रार्थना करने आते थे।

​शिक्षा एवं चिंतन:-

दुर्गी माँ की यह कथा सिद्ध करती है कि श्रीकृष्ण ही समस्त जगत के पालन हार हैं और वही अपने भक्त के प्रेम से पोषित भी होते हैं। जब प्रेम पूर्ण शरणागति का रूप ले लेता है, तब भगवान स्वयं अपने भक्त के भरण-पोषण और सुरक्षा का भार उठा लेते हैं। ​असहाय अवस्था से परम आत्मीयता: भक्ति सांसारिक असहाय अवस्था को भी प्रभु के साथ परम आत्मीयता में बदल देती है। दुर्गी माँ के लिए अकाल कोई विपदा नहीं था, बल्कि अपने लल्ला के वात्सल्य और कृपा को प्रत्यक्ष अनुभव करने का माध्यम बन गया। उनके आँसू भोग बन गए और उनका सांसारिक अभाव ही उनकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक शक्ति बन गया। ​जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता (9.22) में स्वयं वचन देते हैं: ​अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ ​(जो अनन्य भाव से केवल मेरा चिंतन करते हुए प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों की सभी आवश्यकताओं को मैं स्वयं पूरा करता हूँ और जो उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ।)

हरे कृष्ण
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