एक बार की बात है। एक गुरु के कई शिष्य थे। गुरु अपने सभी शिष्यों को अलग-अलग प्रकार से शिक्षा देते थे।
एक दिन गुरुजी के पास कुछ बहुत अच्छे और स्वादिष्ट आम आए।
गुरुजी ने सभी शिष्यों को एक-एक आम दिया और कहा— “यह आम तुम खा लेना, लेकिन एक बात का ध्यान रखना—इसे ऐसी जगह जाकर खाना जहाँ तुम्हें कोई न देखे।”
सभी शिष्य आम लेकर चले गए। किसी शिष्य ने सोचा— “मैं अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लूँगा। वहाँ मुझे कोई नहीं देख पाएगा।”
दूसरे ने सोचा— “मैं जंगल में जाकर खाऊँगा, वहाँ कोई नहीं होगा।”
किसी ने सोचा— “मैं रात में खाऊँगा, जब सब सो रहे होंगे।”
सबने अपनी-अपनी समझ से ऐसी जगह खोज ली जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें कोई नहीं देख रहा।
लेकिन एक शिष्य बहुत देर बाद भी वापस नहीं आया, और जब आया तो आम हाथ में था।
गुरुजी ने पूछा— “तुमने आम क्यों नहीं खाया?”
शिष्य ने विनम्रता से कहा— “गुरुदेव, आपने कहा था कि आम ऐसी जगह जाकर खाना जहाँ मुझे कोई न देखे।
मैंने बहुत जगह खोजी, लेकिन ऐसी कोई जगह मुझे मिली ही नहीं।”
गुरुजी ने पूछा— “ऐसा क्यों?”
शिष्य बोला— “क्योंकि मैं जहाँ भी गया, वहाँ मुझे लगा कि कोई न कोई मुझे देख रहा है।”
गुरुजी ने पूछा— “कौन देख रहा था?”
शिष्य ने कहा— “गुरुदेव, भगवान! मैं जहाँ भी गया, वहाँ भगवान मेरे साथ थे।
संसार से तो मैं छिप सकता हूँ, लेकिन भगवान से कैसे छिप सकता हूँ?”
यह सुनकर गुरुजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— “तुमने मेरी शिक्षा समझ ली।”
फिर गुरुजी ने सभी शिष्यों को समझाया—
“तुमने सोचा कि ऐसी जगह जाकर आम खाओगे जहाँ तुम्हें कोई नहीं देखेगा।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसी कोई जगह है जहाँ तुम्हें कोई देख न रहा हो?
भगवान हर जगह उपस्थित हैं। हम संसार से छिप सकते हैं, लोगों की आँखों से बच सकते हैं, लेकिन भगवान से कुछ भी छिपा नहीं सकते।
भगवान हमारे हृदय में परमात्मा के रूप में विराजमान हैं और हमारे प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं।”
भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ — भगवद्गीता 6.30
“जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और न ही वह मेरे लिए कभी अदृश्य होता है।”
श्री मदभागवत में भी कहा गया है:-
सूर्योऽग्निः खं मरुद्देवः सोमः सन्ध्याहनी दिशः। कं कुः स्वयं धर्म इति ह्येते दैह्यस्य साक्षिणः॥ 6.1.42
सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, देवता, चंद्रमा, संध्या, दिन-रात, सभी दिशाएँ, जल, पृथ्वी और स्वयं परमात्मा—ये सभी जीव के कर्मों के साक्षी हैं।

शिक्षा - श्रील प्रभुपाद भी इस श्लोक की व्याख्या में बताते हैं कि मनुष्य सोचता है—“मैंने चोरी या कोई पाप छिपकर किया है, मुझे किसी ने नहीं देखा।” लेकिन ऐसा संभव नहीं है। इतने सारे साक्षी हमारे कर्मों को देख रहे हैं और सबसे ऊपर परमात्मा हमारे हृदय में विराजमान हैं। यही स्मरण हमें भीतर से सजग रखता है। जब मन में यह भाव दृढ़ हो जाता है कि— “मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे हर कर्म के साक्षी भगवान हैं,” तब मनुष्य अकेले में भी गलत कर्म करने से बचता है। सच्ची सजगता तब आती है, जब हमें भगवान की सर्वव्यापकता और परमात्मा की साक्षी-भावना का अनुभव होने लगे। भगवान से कुछ भी छिपा नहीं है। इसलिए हर कर्म करने से पहले स्वयं से पूछिए— “क्या मैं यह कर्म भगवान के सामने कर सकता हूँ?”
