International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

Hare Krishna Hare Krishna, Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama, Rama Rama Hare Hare

अनोखा स्वाद: उबंटू — मिलकर खाने का सुख
← सभी कहानियाँवैष्णव कहानी

अनोखा स्वाद: उबंटू — मिलकर खाने का सुख

एक समय की बात है, पहाड़ियों के बीच बसा हुआ सुंदरपुर नाम का एक छोटा और शांत गाँव था।

भाषा:

एक समय की बात है, पहाड़ियों के बीच बसा हुआ सुंदरपुर नाम का एक छोटा और शांत गाँव था।

वहाँ के लोग बहुत सीधे-साधे थे और बच्चे दिनभर मिल-जुलकर खेला करते थे।

एक दिन, उस गाँव में बाहर से एक अनजान राहगीर आया। वह काफी दूर से यात्रा करके आया था और बहुत थका हुआ था।

गाँव के लोगों ने उसकी बहुत खातिरदारी की, उसे पानी पिलाया और आराम करने के लिए जगह दी।

वह राहगीर गाँव वालों के इस अच्छे व्यवहार से बेहद खुश हुआ।उसके पास एक बड़ी सी टोकरी थी, जिसमें बहुत ही मीठे, रसीले और दुर्लभ फल भरे हुए थे।

ऐसे फल उस गाँव में पहले कभी किसी ने नहीं देखे थे।

जब वह राहगीर जाने लगा, तो उसने देखा कि गाँव के एक कोने में एक छोटी सी बच्ची, जिसका नाम पिंकी था, बहुत ही मासूमियत से गुड़िया से खेल रही थी।

राहगीर ने पिंकी को पास बुलाया और वह फलों से भरी टोकरी उसे सौंपते हुए कहा, "यह लो छोटी बच्ची, तुम्हारी अच्छाई के लिए यह मेरा उपहार है। इन मीठे फलों को तुम अकेले आराम से बैठकर खाना।

राहगीर को लगा था कि पिंकी टोकरी लेकर कहीं छुप जाएगी और अकेले ही सारे फल खा जाएगी।

लेकिन पिंकी ने ऐसा नहीं किया।टोकरी हाथ में आते ही पिंकी का चेहरा खुशी से खिल उठा।

उसने तुरंत दौड़कर गाँव के चौराहे पर जाकर ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाई, "छोटू! मीना! राहुल! सब जल्दी यहाँ आओ! देखो मेरे पास क्या है!" पिंकी की आवाज़ सुनकर गाँव के सारे बच्चे दौड़ते हुए वहाँ इकट्ठा हो गए। पिंकी ने सभी बच्चों को एक गोल घेरे में बिठाया। फिर उसने टोकरी खोली और बड़े ही प्यार से बराबर-बराबर हिस्से करके सारे फल सभी बच्चों में बाँट दिए।

सभी बच्चे खुशी से नाचने लगे और आपस में हँसते-खेलते हुए उन रसीले फलों का आनंद लेने लगे।

यह सब देखकर वह राहगीर हैरान रह गया। वह पिंकी के पास गया और उत्सुकता से पूछा, "पिंकी, मैंने तो यह पूरी टोकरी सिर्फ तुम्हें दी थी।

अगर तुम चाहतीं तो ये सारे अनोखे फल अकेले खा सकती थीं। तुम्हें बहुत सारे फल मिलते। तुमने इन्हें सब में क्यों बाँट दिया?" पिंकी ने बहुत ही मासूमियत से मुस्कुराते हुए जवाब दिया: "काका, अकेले खाने में वो मज़ा कहाँ? अगर मैं अकेले खाती, तो मेरे दोस्त मुझे देखते और उदास हो जाते। अपने दोस्तों को उदास देखकर मैं खुश कैसे रह सकती थी? जब हम सब साथ मिलकर खाते हैं, तो फल और भी मीठे लगने लगते हैं। असली मज़ा तो साथ मिलकर खाने में ही है!

"राहगीर पिंकी की इतनी बड़ी और सुंदर सोच देखकर दंग रह गया। उसने पिंकी को गले से लगा लिया और समझ गया कि खुशियाँ बाँटने से ही बढ़ती हैं।

अनोखा स्वाद: उबंटू — मिलकर खाने का सुख
शिक्षा - "बाँटने से खुशियाँ और स्वाद दोनों दोगुने हो जाते हैं। "यह कहानी हमें सिखाती है कि स्वार्थी बनकर अकेले सुख भोगने में वो आनंद नहीं है, जो अपनों के साथ मिल-जुलकर चीजें साझा करने (Sharing) में है। सच्ची खुशी दूसरों को खुश देखने में ही मिलती है।
हरे कृष्ण
← और वैष्णव कहानियाँ पढ़ें