एक बार राजा जनक से कुछ ब्राह्मणों ने पूछा कि आप इतने भोग ऐश्वर्य में रहकर भी इतनी अच्छी भक्ति कैसे कर लेते हैं? तो राजा जनक ने उनसे कहा कि कल आप हमारे घर पर भोजन के लिए आइए, तब मैं आपको इसका उत्तर दूंगा।
दूसरे दिन सभी ब्राह्मण उनके घर भोजन करने के लिए गए, तो बहुत सारा स्वादिष्ट भोजन बनाया हुआ था और बहुत स्वादिष्ट व्यंजन लगे हुए थे, लेकिन हर थाली के ऊपर घोड़े के बाल से तलवार को लटका कर रखा हुआ था। घोड़े का बाल बहुत ही पतला होता है, तो जब वे भोजन करने बैठे, उनका ध्यान यही था कि तलवार उनके सिर पर न गिर जाए। बहुत सारे व्यंजन थे, पर उनकी जिह्वा में स्वाद ही नहीं आ रहा था, थाली का आनंद नहीं ले पा रहे थे।

जब भोजन समाप्त हो गया तो राजा ने पूछा, "आनंद आया? कैसा था भोजन?" ब्राह्मण बोले, "कहाँ आनंद आया? सिर पर तलवार लटक रही थी, ठीक से खाया ही नहीं गया। सारा ध्यान तलवार पर ही था।" तो राजा ने कहा, "इसी प्रकार से मैं हमेशा याद रखता हूँ कि मृत्यु रूपी तलवार मेरे सिर पर लटकी हुई है, इसलिए मैं इस भोग ऐश्वर्य के आनंद को ले नहीं पाता। ये सब अस्थाई है, कभी भी छिन सकता है, इसलिए मैं अनासक्त रह पाता हूँ।"
भागवत गीता ९.३३ में भी कहा गया है - "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्" अर्थ: अतः इस क्षणिक दुखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाओ।
शिक्षा: ये जगत अशाश्वत है और मृत्यु अटल है, किसी भी समय आ सकती है और तब हमें सब छोड़कर जाना होगा। ये हमेशा याद रहेगा तो जीवन में वैराग्य आ पाएगा और हम अच्छे से भक्ति कर पाएंगे।