एक बार एक बहुत धनी व्यक्ति ने एक अत्यंत सुंदर युवती को देखा। उसकी सुंदरता देखकर वह उसके प्रति बहुत आकर्षित हो गया और उससे मिलने की इच्छा व्यक्त करने लगा। वह युवती समझ गई कि यह व्यक्ति उसके बाहरी सौंदर्य से आकर्षित है। उसने कहा— “ठीक है, आप एक सप्ताह बाद मेरे घर आइए।” वह व्यक्ति बड़ी उत्सुकता से एक सप्ताह बाद उसके घर पहुँचा। लेकिन वहाँ उसे एक बहुत दुबली-पतली, कमजोर और सांवली-सी युवती दिखाई दी। वह उसे पहचान ही नहीं पाया। उसने पूछा— “वह सुंदर लड़की कहाँ है, जिससे मैं मिलने आया हूँ?” युवती ने कहा— “मैं ही वही लड़की हूँ।” वह व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर बोला— “लेकिन तुम तो बहुत सुंदर थीं! तुम्हारा यह हाल कैसे हो गया?” तब युवती ने कहा— “आप मेरी सुंदरता से आकर्षित थे न? मैंने अपनी सारी सुंदरता अलग करके रख दी है। आइए, मैं आपको दिखाती हूँ।” वह उसे दो बर्तनों के पास ले गई, जिनमें पिछले कई दिनों से उसके शरीर से निकला हुआ मल और उल्टी एकत्रित थी। उसने कहा— “यही है मेरी सुंदरता। मेरे शरीर में जो कुछ था, वही अब इन बर्तनों में है। जिस चीज़ को देखकर आप इतने आकर्षित हो रहे थे, उसके पीछे वास्तव में क्या है—यह देख लीजिए।” उस व्यक्ति को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि वह जिस बाहरी सौंदर्य के पीछे भाग रहा था, वह वास्तव में क्षणभंगुर और भौतिक शरीर की सुंदरता थी। श्रील प्रभुपाद इस कथा के माध्यम से समझाते थे कि हम अक्सर त्वचा की सुंदरता को वास्तविक सुंदरता समझ लेते हैं, जबकि शरीर स्वयं अस्थायी है। असली सुंदरता शरीर की नहीं, आत्मा की और कृष्ण-चेतना की है। भगवद्गीता 2.22 वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य् अन्यानि संयाति नवानि देही॥ जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
शिक्षा :- शरीर वस्त्र के समान है—जड़ और परिवर्तनशील; आत्मा चेतन और शाश्वत। इसलिए वास्तविक सुंदरता शरीर की नहीं, उस चेतन आत्मा की है, जिसका शाश्वत संबंध श्रीकृष्ण से है।
