International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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सच्ची प्रार्थना
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सच्ची प्रार्थना

हर दिन सुबह-सुबह एक छोटी-सी लड़की मंदिर आती थी। वह भगवान की मूर्ति के सामने खड़ी होती, आँखें बंद करती, हाथ जोड़ती और दो-तीन मिनट तक धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाती रहती। फिर आँखें खोलती, प्रणाम करती, मुस्कुराती और दौड़ती हुई बाहर चली जाती। यह उसका रोज़ का नियम था।

भाषा:

हर दिन सुबह-सुबह एक छोटी-सी लड़की मंदिर आती थी। वह भगवान की मूर्ति के सामने खड़ी होती, आँखें बंद करती, हाथ जोड़ती और दो-तीन मिनट तक धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाती रहती। फिर आँखें खोलती, प्रणाम करती, मुस्कुराती और दौड़ती हुई बाहर चली जाती। यह उसका रोज़ का नियम था।

मंदिर के पुजारी कई दिनों से उसे देख रहे थे। उन्हें बड़ी जिज्ञासा हुई। उन्होंने सोचा, “यह बच्ची अभी बहुत छोटी है। इसे धर्म के गहरे अर्थ कहाँ समझ आते होंगे? इसे कोई प्रार्थना भी शायद नहीं आती होगी। फिर यह रोज़ यहाँ क्या करती है?”

पंद्रह दिन बीत गए। अब पुजारी अपनी जिज्ञासा रोक न सके। एक सुबह वे लड़की के आने से पहले ही मंदिर पहुँच गए और उसके प्रार्थना पूरी करने का इंतज़ार करने लगे।

जब वह उठकर जाने लगी, तो पुजारी ने उसके सिर पर हाथ रखा और पूछा— “बेटी, मैं पिछले पंद्रह दिनों से देख रहा हूँ कि तुम रोज़ यहाँ आती हो। तुम क्या करती हो?” लड़की ने तुरंत कहा— “मैं प्रार्थना करती हूँ।” पुजारी ने थोड़े संदेह से पूछा— “क्या तुम्हें कोई प्रार्थना आती है?”नहीं! पुजारी मुस्कुराए और बोले— “तो फिर तुम रोज़ आँखें बंद करके क्या करती हो?”

बड़ी मासूमियत से लड़की बोली— “मुझे कोई प्रार्थना नहीं आती, लेकिन मुझे A, B, C, D… से लेकर Z तक सारे अक्षर आते हैं। मैं उन्हें पाँच बार बोल देती हूँ और भगवान से कहती हूँ—‘हे भगवान! मुझे आपकी प्रार्थना नहीं आती, लेकिन आपकी प्रार्थना इन्हीं अक्षरों से बनी होगी। आप अपनी इच्छा से इन्हें जोड़ दीजिए, वही मेरी प्रार्थना है।’” यह कहकर वह उछलती-कूदती मंदिर से बाहर चली गई।

पुजारी वहीं स्तब्ध खड़े रह गए। वे देर तक उसे जाते हुए देखते रहे, जब तक वह उनकी आँखों से ओझल नहीं हो गई।

सच्ची प्रार्थना

ब्रह्माजी श्रीमद्भागवतम् 10.14.3 में अपनी प्रार्थनाओं में कहते है - "ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्। स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिर् ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्॥"

हे अजित (जिसे कोई जीत नहीं सकता)! जो लोग अहंकारपूर्ण ज्ञान के प्रयास को छोड़कर विनम्रता से झुकते हैं, और संतों के मुख से आपकी कथाओं को सुनते हैं, वे अपने-अपने स्थान पर रहते हुए भी शरीर, वाणी और मन से आपकी सेवा करते हैं। ऐसे लोग आपको, जो तीनों लोकों में अजेय हैं, प्रेम और भक्ति से जीत लेते हैं।

शिक्षा -उस छोटी बच्ची के पास विद्वत्ता नहीं थी, पर उसके पास सरलता, विश्वास और निष्कपट प्रेम था। इसलिए कहा गया है— "ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव." भगवान को केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि विनम्र और सरल हृदय से जीता जा सकता है। बालसुलभ विश्वास और निष्कपट भक्ति ही भगवान को सबसे अधिक प्रिय है।
हरे कृष्ण
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