एक बार राजा महेंद्र अपने मंत्री के साथ वेश बदलकर नगर का भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक व्यक्ति को बैठे हुए और गहरे विचारों में डूबा देखा। अगले दिन उन्होंने उसे फिर उसी मुद्रा में देखा। उसे देखकर राजा ने कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है कि इस व्यक्ति को दंड देना चाहिए, जबकि इसने कोई गलत काम नहीं किया है।”
मंत्री ने बुद्धिमानी से उत्तर दिया, “मैं पहले इसके बारे में सब पता लगाऊँगा।”
बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि वह व्यक्ति चंदन का व्यापारी है। मंत्री ने राजा से अनुमति लेकर चंदन से कुछ फर्नीचर और मंदिर के लिए एक कार बनवाने का आदेश दिया। राजा ने सहमति दे दी और मंत्री से आगे बढ़ने को कहा। राजा ने उस कार्य की प्रशंसा की।
कुछ दिनों बाद जब वे फिर भ्रमण पर निकले, तो उन्हें वही व्यक्ति दिखाई दिया। इस बार राजा ने कहा, “क्या तुम इस व्यक्ति को पहचानते हो? आज इसके प्रति मेरे मन में कोई बुरा भाव नहीं है।”
मंत्री ने उत्तर दिया, “हाँ, यह चंदन का व्यापारी है। उस दिन इसका व्यापार बहुत मंदा चल रहा था, इसलिए इसके मन में भी बुरे विचार आ रहे थे। यह सोच रहा था कि यदि आप मर जाएँ, तो आपके अंतिम संस्कार के लिए उसका चंदन खरीदा जाएगा। इस विचार ने उसके मन और शरीर दोनों को प्रभावित किया। इसलिए स्वाभाविक रूप से आपके प्रति उसके मन में एक प्रकार की विरक्ति उत्पन्न हो गई थी। लेकिन आज हमने उसे अच्छा व्यापार दिया है, इसलिए अब वह आपका धन्यवाद कर रहा है और आपकी दीर्घायु की कामना कर रहा है।”
तब राजा ने कहा, “यदि कोई व्यक्ति हमारे बारे में बुरा सोचता है, तो अनजाने में ही हमारे मन में भी उसके प्रति बुरा भाव उत्पन्न होने लगता है। क्या यही तुम्हारा स्पष्टीकरण है?”
मंत्री ने उत्तर दिया, “केवल इतना ही नहीं। यदि हम दूसरों के बारे में सदैव अच्छा सोचें, तो दूसरे लोग भी हमारे प्रति अच्छा अनुभव करेंगे।”

सुनीति, ध्रुव महाराज की माता, नैतिकता का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। जब ध्रुव महाराज अपनी सौतेली माता द्वारा अपमानित होकर रोते हुए उनके पास आए, तो उन्होंने कहा (श्रीमद्भागवत ४.८.१७) -
“मा मङ्गलं तात परेषु मंस्थाः भुङ्क्ते जनो यत् परदुःखदस्तत्”
अर्थ: “हे मेरे प्रिय पुत्र! दूसरों के लिए कभी अमंगल की कामना मत करो। जो दूसरों को दुःख पहुँचाता है, वह स्वयं उसी दुःख का फल भोगता है।”
शिक्षा: “हमारे मन के विचार और हमारी चेतना का सूक्ष्म प्रभाव दूसरों पर भी पड़ता है; इसलिए सदैव शुद्ध, शुभ और मंगलमय चिंतन करना चाहिए।”