International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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पुनर्मूषको भव (फिर से चूहा बन जाओ)
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पुनर्मूषको भव (फिर से चूहा बन जाओ)

एक नदी के किनारे एक बहुत बड़े और सिद्ध साधु का आश्रम था। एक दिन एक छोटा सा चूहा कहीं से भागता हुआ आया और साधु की गोद में छिप गया। वह डर से काँप रहा था।

भाषा:

एक नदी के किनारे एक बहुत बड़े और सिद्ध साधु का आश्रम था। एक दिन एक छोटा सा चूहा कहीं से भागता हुआ आया और साधु की गोद में छिप गया। वह डर से काँप रहा था।

साधु के पास अकसर लोग भौतिक आशीर्वाद लेने आते है,उन्हें भक्ति या कृष्ण नहीं चाहिए,बस भोग चाहिए।

साधु: "क्या बात है ? तुम इतना क्यों डर रहे हो?

"चूहा: "महाराज! मुझे बिल्ली से बहुत डर लगता है। वह मुझे खा जाएगी, आप मेरी मदद करो।

"साधु: "तो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?

चूहा: "आप अपनी शक्ति से मुझे एक बिल्ली बना दो, ताकि मेरा डर खत्म हो जाए।

"साधु: "तथास्तु!"

साधु के कहते ही वह चूहा एक सुंदर बिल्ली बन गया। बिल्ली बनकर वह आराम से आश्रम में घूमने लगा।

लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह फिर से हाँफता और डरता हुआ साधु के पास आया।

बिल्ली (चूहा): "महाराज! गजब हो गया। एक शिकारी कुत्ता मेरे पीछे भाग रहा है। वह मुझे मार डालेगा, मेरी रक्षा कीजिए!

"साधु: "अब मैं क्या करूँ तुम्हारे लिए?

"बिल्ली (चूहा): "आप मुझे एक बलवान कुत्ता बना दीजिए।

"साधु: "तथास्तु!"

साधु की कृपा से वह कुत्ता एक विशाल और भयानक शेर बन गया। अब उसे किसी का डर नहीं था। पूरा जंगल उससे डरने लगा।

उस शेर में अहंकार आ गया और वो साधु को घूर घूर के देखने लगा।साधु ने पूछा तुम मुझे खाना चाहते हो?

शेर ने कहा "हां"! "और उस कृतघ्न (उपकार न मानने वाले) शेर ने साधु पर हमला करने के लिए छलांग लगाई।

साधु अपने तपोबल से उसके मन के इस पाप को तुरंत जान गए। उन्होंने अपनी उंगली उठाई और गुस्से में कहा— "पुनर्मूषको भव!" (फिर से चूहे बन जाओ)।

इस कहानी के अंत में हितोपदेश ग्रंथ में यह श्लोक कहा गया है:

"नीचः श्लाघ्यपदं प्राप्य स्वामिनं हन्तुमिच्छति।मूषको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हन्तुं गतो यथा॥"

जिस प्रकार एक मामूली चूहा बाघ (शेर) का रूप पाने के बाद अपने ही उपकारी मुनि (साधु) को मारने के लिए दौड़ पड़ा था; ठीक उसी तरह जब किसी ओछे या दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति को कोई बड़ा पद, पैसा या ताकत मिल जाती है, तो वह सबसे पहले अपने मालिक या उपकार करने वाले का ही नुकसान करने की कोशिश करता है।

शिक्षा -श्रील प्रभुपाद कहते थे कि यदि कोई शिष्य अपने गुरु की कृपा से ज्ञान, सम्मान या आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करता है, और बाद में अहंकारी होकर सोचने लगता है कि "अब तो मैं गुरु से भी बड़ा हो गया हूँ, मैं गुरु की जगह ले सकता हूँ," तो वह उसी बाघ की तरह है जो अपने ही उपकारी साधु को खाने दौड़ा था। ऐसे अहंकारी व्यक्ति से भगवान उसकी सारी शक्तियां छीन लेते हैं और वह वापस अपने पुराने भौतिक स्तर पर गिर जाता है (यानी फिर से चूहा बन जाता है)। इस भौतिक जगत में प्रगति करने वाले लोग भी भगवान को मारना चाहते हैं,पर वे ये नहीं जानते कि भगवान जब चाहे उन्हें राजा से रंक बना सकते हैं। इसलिए हमें जो मिले है उसके लिए कृतज्ञ रहना चाहिए।
पुनर्मूषको भव (फिर से चूहा बन जाओ)
हरे कृष्ण
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