एक बार दो मित्र आपस में मिले। पहले मित्र ने दूसरे से पूछा— “तुम सच में इन सब बातों पर विश्वास करते हो?”
दूसरे ने पूछा— “किस बात पर?”
वह बोला— “यही कि भगवान वास्तव में हैं… हम भक्ति करके, भगवान का नाम जपकर, शास्त्रों का अध्ययन करके और साधु-संग करके भगवान को प्राप्त कर सकते हैं?
क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि यह सब करने से हमें जीवन में कोई वास्तविक लाभ मिलेगा?”
दूसरा मित्र मुस्कुराकर बोला— “हाँ, मुझे पूरा विश्वास है।”
पहला मित्र बोला— “लेकिन तुम्हें कैसे पता? क्या तुमने भगवान को देखा है? क्या तुम्हें पता है कि यह यात्रा तुम्हें सच में भगवान तक पहुँचा देगी?”
दूसरा मित्र बोला— “एक बात बताओ, तुम कभी प्लेन में बैठे हो?” “हाँ, कई बार।”
“जब तुम प्लेन में बैठते हो, तो क्या तुम्हें पता होता है कि इस प्लेन को किसने बनाया है?”
“नहीं।”
“पायलट कौन है, यह पता होता है?” “ नहीं"
“तुम्हें यह भी पता होता है कि प्लेन के अंदर का हर सिस्टम कैसे काम करता है?” “नहीं।”
“और जब प्लेन उड़ता है, तब तुम्हें यह भी नहीं पता होता कि रास्ते में मौसम कैसा मिलेगा, turbulence कितना होगा या यात्रा के दौरान क्या-क्या होगा।”
पहला मित्र बोला— “हाँ, यह सब तो नहीं पता होता।”
दूसरा मित्र मुस्कुराकर बोला— “फिर भी तुम प्लेन में बैठ जाते हो… क्यों?”
वह बोला— “क्योंकि मुझे विश्वास होता है कि यह प्लेन मुझे मेरे गंतव्य तक पहुँचा देगा।”
“लेकिन यह विश्वास आया कहाँ से?”
वह बोला— “क्योंकि मुझसे पहले लाखों लोग इसी यात्रा से अपने गंतव्य तक पहुँच चुके हैं।”
दूसरा मित्र बोला— “बस! भक्ति की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है।”
जब हम पहली बार भक्ति के मार्ग पर आते हैं, तो हमारे मन में भी बहुत से प्रश्न होते हैं—
क्या वास्तव में भगवान हैं? क्या जप करने से मुझे भगवान की प्राप्ति होगी? क्या शास्त्र पढ़ने से मेरा जीवन बदलेगा? गुरु कौन होंगे? क्या भक्तों के संग में मेरी यह यात्रा आगे बढ़ेगी?
इनमें से हर प्रश्न का उत्तर हमें शुरुआत में नहीं पता होता।
लेकिन हम देखते हैं कि हमसे पहले असंख्य भक्त इस मार्ग पर चले हैं।
उन्होंने साधु-संग किया, भगवान का नाम जप किया , शास्त्रों का श्रवण किया, भक्ति का अभ्यास किया और अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त किया।
तो अगर इतने सारे लोग इस मार्ग पर चलकर अपने गंतव्य तक पहुँच चुके हैं, तो क्यों न हम भी उनके अनुभव पर विश्वास करके इस यात्रा में अपना पहला कदम रखें?
लेकिन यहाँ एक और प्रश्न आता है— क्या श्रद्धा करना हमारे लिए स्वाभाविक है?
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं— “श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।” (भगवद्गीता 17.3)
अर्थात, मनुष्य श्रद्धामय है—जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, उसका व्यक्तित्व और जीवन भी उसी के अनुरूप बनता है। हम सभी किसी न किसी चीज़ पर श्रद्धा रखते हैं।
किसी को डॉक्टर पर श्रद्धा है, किसी को विज्ञान पर, किसी को अपने गुरु या शिक्षक पर, किसी को किसी व्यक्ति की बात पर।
हम बहुत-सी चीज़ें ऐसी भी स्वीकार करते हैं जिन्हें हमने स्वयं पूरी तरह अनुभव नहीं किया है।
तो फिर प्रश्न यह नहीं है कि—
“मैं श्रद्धा करूँ या नहीं?”
प्रश्न यह है— “मेरी श्रद्धा किस पर है?”
अगर श्रद्धा हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, तो क्यों न इस श्रद्धा को भगवान पर रखें? क्यों न इसे शास्त्रों पर रखें? क्यों न इसे भक्ति के मार्ग पर रखें?
हो सकता है शुरुआत में हमारे पास सारे उत्तर न हों। लेकिन श्रद्धा हमें पहला कदम उठाने की शक्ति देती है।
चैतन्य चरितामृत में कहा गया है— “श्रद्धा-शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय। कृष्ण-भक्ति करिले सर्व-कर्म कृत्य होय॥”
अर्थात— श्रद्धा का अर्थ है—यह दृढ़ विश्वास कि कृष्ण की भक्ति करने से जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा।
भक्ति की यात्रा शुरू करने के लिए हमें हर चीज़ का उत्तर पहले से जानना आवश्यक नहीं है। जैसे हम प्लेन में बैठते समय पूरे विमान को समझकर नहीं बैठते, वैसे ही भक्ति में भी पहला कदम पूर्ण ज्ञान से नहीं, श्रद्धा से उठता है।
और जैसे-जैसे हम इस यात्रा पर आगे बढ़ते हैं, दूसरों का अनुभव धीरे-धीरे हमारा अपना अनुभव बनने लगता है। फिर श्रद्धा केवल विश्वास नहीं रहती— वह अनुभव में बदलने लगती है।
इसलिए— श्रद्धा को रोकिए मत, उसे सही दिशा दीजिए।

भगवान पर श्रद्धा रखकर, भक्ति पर विश्वास रखकर, बस एक कदम आगे बढ़ाइए। पहले श्रद्धा से कदम बढ़ाइए, फिर अनुभव स्वयं आपका विश्वास दृढ़ करता जाएगा।
