International Society for Krishna Consciousness

Founder Acharya — HDG A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

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अहो रूपम्, अहो ध्वनिः!  (झूठी प्रशंसा और हमारी चेतना)
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अहो रूपम्, अहो ध्वनिः! (झूठी प्रशंसा और हमारी चेतना)

एक बार की बात है, ऊँटों के घर में एक विवाह उत्सव था। उस विवाह में मेहमान के रूप में कुछ गधे भी आए। उत्सव के दौरान, गधों ने अपनी आदत के अनुसार ज़ोर-ज़ोर से रेंकना (चिल्लाना) शुरू कर दिया।

भाषा:

एक बार की बात है, ऊँटों के घर में एक विवाह उत्सव था। उस विवाह में मेहमान के रूप में कुछ गधे भी आए। उत्सव के दौरान, गधों ने अपनी आदत के अनुसार ज़ोर-ज़ोर से रेंकना (चिल्लाना) शुरू कर दिया। गधों की इस बेसुरी आवाज़ को सुनकर ऊँटों ने बड़ी प्रसन्नता से कहा— “अहो ध्वनिः! अहो ध्वनिः! वाह, क्या मधुर और सुंदर आवाज़ है!” अपनी तारीफ सुनकर गधे भी फूले नहीं समाए। उन्होंने भी ऊँटों के बेडौल शरीर की ओर देखा और बड़े आदर से कहा— “अहो रूपम्! अहो रूपम्! वाह, आपका रूप-रंग और कद-काठी कितनी सुंदर है!” इस प्रकार, दोनों पशु एक-दूसरे की कमियों को नजरअंदाज करके, केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए एक-दूसरे की झूठी प्रशंसा करने लगे। उनका मूल मंत्र यही था—“तुम मेरी प्रशंसा करो, मैं तुम्हारी प्रशंसा करूँगा।” जीवन का कड़वा सच यह कहानी सुनने में बहुत हास्यास्पद और काल्पनिक लगती है, लेकिन यदि हम गहराई से विचार करें, तो कहीं हमारा आज का सामाजिक जीवन भी ऐसा ही तो नहीं हो गया है? हम चौबीसों घंटे इसी प्रयास में रहते हैं कि लोग हमारी, हमारे परिवार की, हमारी उपलब्धियों की और हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा की झूठी या सच्ची प्रशंसा करें। और बदले में, समाज में बने रहने के लिए हम भी दूसरों की वैसी ही चापलूसी करते हैं। धीरे-धीरे यह झूठी प्रशंसा हमारे अहंकार (Ego) को इतना बढ़ा देती है कि हम अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य और आत्म-तत्त्व को पूरी तरह भूल जाते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण का दिव्य संदेश (2.3.20) इस 'अहो रूपम्, अहो ध्वनिः' (व्यर्थ का बोलना और व्यर्थ का सुनना) की मानसिकता पर श्रीमद्भागवतम् में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को समझाते हुए एक बहुत ही तीखा और जागृत करने वाला श्लोक कहते हैं: "बिलायने ते उरुक्रमविक्रमान् ये न शृण्वन्ति कर्णपुटैः नरस्य । जिह्वा असती दार्दुरिकेव सूत न चोुपगायत्युरुगायगाथाः ॥" • कानों के लिए: वे मनुष्य के कान जो भगवान की दिव्य महिमा और कथाओं को नहीं सुनते, वे केवल सिर पर मांस के टुकड़े हैं जो साँपों के बिल की तरह व्यर्थ हैं। • जीभ के लिए: और वह जीभ (जिह्वा) जो भगवान के गुणों का गान करने के बजाय संसारी लोगों की झूठी प्रशंसा, चापलूसी या व्यर्थ की सांसारिक बातें करती है, वह मेंढक की जीभ के समान है जो केवल 'टर्र-टर्र' का व्यर्थ शोर करके अपनी मृत्यु (काल) को आमंत्रण देती है।

शिक्षा

इस कहानी और श्लोक का सार यही है कि हमें अपनी चेतना को बदलना होगा। हमें इस दौड़ से बाहर निकलना होगा कि “लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं या मेरी क्या तारीफ करते हैं?” (गधा-ऊँट चेतना) और इसकी जगह यह सोचना शुरू करना होगा कि “भगवान मुझसे क्या चाहते हैं और मेरी इंद्रियां उनकी सेवा में कैसे लग सकती हैं?”

हरे कृष्ण
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