प्रत्यक्ष सत्य और संसार का भ्रम प्राचीन समय की बात है, मित्रशर्मा नाम के एक सीधे-सादे और धर्मपरायण ब्राह्मण रहते थे। एक यजमान के घर बड़ा धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने के बाद, यजमान ने आदरपूर्वक उन्हें एक स्वस्थ और हट्टा-कट्टा बकरा दक्षिणा में दिया। ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बकरे को अपने कंधे पर उठाया और अपने गांव की राह पकड़ ली। उसी रास्ते पर तीन धूर्त ठग घात लगाए बैठे थे। उन्होंने जब मोटे-ताजे बकरे को देखा, तो उनके मन में लालच जाग उठा। ब्राह्मण को सीधे बल से हराना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने मिलकर एक छलकपट की योजना बनाई और रास्ते में कुछ-कुछ दूरी पर अलग-अलग खड़े हो गए। ब्राह्मण थोड़ी ही दूर चले थे कि पहला ठग हाथ जोड़कर सामने आया और हैरानी से बोला, "अरे पंडित जी! आप जैसे विद्वान और पवित्र ब्राह्मण होकर इस अपवित्र कुत्ते को कंधे पर क्यों लादे जा रहे हैं? आपका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा!" ब्राह्मण को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने डांटते हुए कहा, "अंधे हो क्या? यह कुत्ता नहीं, एक स्वस्थ बकरा है!" ठग ने कहा, "जैसी आपकी मर्जी महाराज," और आगे बढ़ गया। कुछ कदम आगे चलने पर दूसरा ठग मिला। उसने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "हे ज्ञानी महात्मा! यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? एक पूज्य ब्राह्मण होकर इस मरे हुए बछड़े को ढो रहे हैं? समाज देखेगा तो क्या कहेगा!" अब ब्राह्मण के मन में पहली बार संकोच और संशय ने दस्तक दी। उन्होंने बकरे को नीचे उतारा, अपनी आंखों से देखा, हाथों से छूकर परखा और निश्चिंत हुए कि यह जीवित बकरा ही है। फिर भी, मन में हल्की हिचक के साथ उन्होंने उसे दोबारा कंधे पर लाद लिया। थोड़ी ही दूरी पर तीसरा ठग सिर पकड़कर रोने के अंदाज में बोला, "हे भगवान! कलियुग आ गया! पंडित जी, आपने इस गधे को अपने कंधे पर क्यों बिठा रखा है? क्या बुद्धि भ्रष्ट हो गई है?" तीसरे व्यक्ति के इतना कहते ही ब्राह्मण का सारा आत्मविश्वास टूट गया। वे बुरी तरह भयभीत हो गए। उन्होंने अपनी आंखों के प्रत्यक्ष प्रमाण को झुठला दिया और सोचा कि अवश्य ही यह कोई मायावी राक्षस है जो कभी कुत्ता, कभी मरा बछड़ा और कभी गधा बन रहा है। डर के मारे ब्राह्मण ने बकरे को वहीं जमीन पर पटका और पीछे मुड़े बिना भाग खड़े हुए। तीनों ठगों ने हंसते हुए उस बकरे को उठा लिया। ब्राह्मण के हाथ केवल पछतावा और खालीपन आया। आध्यात्मिक दृष्टिकोण और श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक यह कथा केवल एक ब्राह्मण और ठगों की नहीं, बल्कि साधक के अंतःकरण और सांसारिक कुतर्कों की है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति और आत्मज्ञान के मार्ग को स्पष्ट करते हुए कहते हैं: राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ (श्रीमद्भगवद्गीता 9.2) यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब रहस्यों का राजा, परम पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला (प्रत्यक्षावगमं), धर्मयुक्त, साधन करने में अत्यंत सुगम और अविनाशी है। भगवान कहते हैं कि यह मार्ग 'प्रत्यक्षावगमम्' है—अर्थात इसका सत्य प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। हम शास्त्रों में पढ़ते हैं और संतों के जीवन में अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देखते हैं कि जो भगवान का भजन करते हैं, वे कितने शांत, निर्भय और आनंदित रहते हैं। स्वयं नाम-जप करने पर अंतःकरण में जो शांति मिलती है, वह भी साधक का अपना प्रत्यक्ष अनुभव होता है। लेकिन जैसे ही साधक इस मार्ग पर आगे बढ़ता है, संसार के 'कुतर्की और नास्तिक लोग' (ठगों की भांति) उसे घेर लेते हैं। कोई कहता है—"यह सब अंधविश्वास है", कोई कहता है—"भक्ति से पेट नहीं भरता", तो कोई कहता है—"यह सब बुढ़ापे की बातें हैं।" जब एक ही झूठ को अलग-अलग लोग आत्मविश्वास से बोलते हैं, तो कमजोर मन अपने शास्त्र-प्रमाण और प्रत्यक्ष अनुभव को भूलकर संशय में पड़ जाता है। साधक संशयग्रस्त होकर भक्ति के उस 'सुसुखं' (परम सुखदायी) मार्ग को छोड़ देता है और सांसारिक भ्रम का शिकार होकर अपना ही परम कल्याण खो बैठता है।
शिक्षा :-
सत्य वही है जो शास्त्र-सम्मत और प्रत्यक्ष अनुभव की कसौटी पर खरा उतरे। यदि आपका अनुभव और शास्त्र कहते हैं कि भगवत-भक्ति ही जीवन का परम सत्य और शांति का मार्ग है, तो संसार के किसी भी कुतर्क, लोक-लाज या नास्तिकता के प्रभाव में आकर अपने प्रत्यक्ष सत्य का त्याग कभी न करें। जो दूसरों के बार-बार बोले गए झूठ पर भरोसा करके अपने प्रत्यक्ष ज्ञान पर संदेह करता है, वह जीवन के सबसे बड़े आध्यात्मिक धन से वंचित रह जाता है।
