(The Greedy Cobbler)
एक बार एक बहुत ही गरीब मोची था, जो दिन-भर जूते सिलकर बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी कमा पाता था।
एक दिन उसके पास एक महात्मा आए। मोची ने बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा की और उनके फटे हुए जूते ठीक कर दिए। महात्मा उसकी सेवा से बहुत प्रसन्न हुए और बोले, "मैं तुम्हारी भक्ति से खुश हूँ। मैं तुम्हें एक जादुई पारस पत्थर (Touchstone) देता हूँ। तुम इसे लोहे की जिस भी चीज से छुओगे, वह सोना बन जाएगी। मैं एक साल बाद इसे वापस लेने आऊँगा।"
मोची बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि अब वह दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाएगा। लेकिन उसने तय किया कि वह पहले बाजार से बहुत सारा घटिया और सस्ता लोहा खरीदेगा, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा सोना बना सके।
वह रोज बाजार जाता और लोहे के दाम देखता। कुछ समय बाद लोहे के दाम थोड़े बढ़ गए। मोची ने सोचा, "अभी लोहा महंगा है, जब दाम कम होंगे तब बहुत सारा लोहा एक साथ खरीदूँगा।"
दाम कम होने के इंतजार में महीने बीतते गए। जब साल का आखिरी महीना आया, तो मोची घबरा गया। वह बाजार भागा, लेकिन उस समय लोहे की भारी कमी हो गई और दाम आसमान छूने लगे। उसने सोचा, "अगले हफ्ते पक्का खरीद लूँगा।" इसी टालमटोल में पूरा साल बीत गया।ठीक एक साल बाद, महात्मा वापस आए और बोले, "मेरा पत्थर वापस करो।"
मोची रोने लगा और पैर पकड़कर बोला, "महाराज, मुझे थोड़ा समय और दे दीजिए, मैं अभी तक एक ग्राम सोना भी नहीं बना पाया!"
महात्मा ने मुस्कुराते हुए पत्थर वापस ले लिया और कहा, "तुम्हें अमूल्य अवसर मिला था, लेकिन तुमने उसे आलस्य और सही समय की कीमत न समझकर गँवा दिया।

श्रीमद्भागवतम् में प्रह्लाद महाराज कहते हैं: "कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतान् इह ।दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥"(श्रीमद्भागवतम् ७.५.५)
जो वास्तव में बुद्धिमान (प्राज्ञो) है, उसे बचपन से ही (कौमार) भगवान की भक्ति के मार्ग (भागवत धर्म) का पालन शुरू कर देना चाहिए। क्योंकि यह मनुष्य जन्म (मानुषं जन्म) अत्यंत दुर्लभ है; और भले ही यह शरीर क्षणभंगुर (अध्रुवम् - जिसका कोई भरोसा नहीं) हो, फिर भी यह आत्मा को परम गति दिलाने वाला (अर्थदम्) है।
शिक्षा - श्रील प्रभुपाद समझाते थे कि यह मानव जीवन भी पारस पत्थर के समान है। हमें यह शरीर इसलिए मिला है ताकि हम भगवान की भक्ति करके अपने जीवन को 'सोना' (आनंदमय) बना सकें। लेकिन हम लोग "कल करेंगे, बुढ़ापे में भक्ति करेंगे" कह कर समय टालते रहते हैं। अंत में मृत्यु आ जाती है और हम बिना कोई आध्यात्मिक प्रगति किए खाली हाथ चले जाते हैं।
