एक गाँव में छह अंधे व्यक्ति रहते थे। वे सभी जन्म से दृष्टिहीन थे, लेकिन बहुत जिज्ञासु थे। वे संसार की हर वस्तु को छूकर, महसूस करके और समझने का प्रयास करते थे।
एक दिन गाँव में खबर फैली—
“गाँव में हाथी आया है! हाथी आया है!”
छः अंधों ने आपस में कहा,
पहला व्यक्ति: “हमने हाथी के बारे में बहुत सुना है, लेकिन कभी जाना नहीं कि हाथी वास्तव में होता कैसा है।”
दूसरा व्यक्ति बोला: “हाँ! लोग कहते हैं कि हाथी बहुत विशाल होता है।”
तीसरे ने उत्सुक होकर कहा: “चलो, आज हम स्वयं उसे छूकर पता लगाते हैं कि हाथी आखिर है क्या!”
सभी उत्साह से हाथी के पास पहुँचे। हाथी शांत खड़ा था। अब छहों व्यक्तियों ने हाथी के अलग-अलग अंगों को छूना शुरू किया।
पहला व्यक्ति – हाथी का पैर पहले व्यक्ति के हाथ में हाथी का पैर आया। उसने पैर को ऊपर से नीचे तक छुआ और तुरंत बोला—
“अरे! अब मैं समझ गया। हाथी तो बिल्कुल एक बड़े खंभे जैसा होता है!”
वह बड़े विश्वास से बोला, “जिसने हाथी को नहीं देखा, वह मेरी बात मान ले। हाथी एक विशाल खंभा है।”
दूसरा व्यक्ति – दूसरे व्यक्ति ने हाथी की सूँड़ पकड़ ली। वह सूँड़ को इधर-उधर महसूस करने लगा।
फिर बोला— “तुम बिल्कुल गलत कह रहे हो! हाथी खंभा नहीं हो सकता।” पहला व्यक्ति बोला— “मैंने स्वयं छूकर देखा है!”
दूसरा व्यक्ति बोला— “और मैंने भी स्वयं छूकर देखा है। हाथी तो एक बड़े साँप जैसा है—लंबा, मोटा और हिलने वाला!”
तीसरा व्यक्ति – तीसरे व्यक्ति ने हाथी का कान छू लिया। उसने कान को फैलाकर महसूस किया और हँसते हुए बोला—
“तुम दोनों को कुछ पता ही नहीं है!” “हाथी न खंभा है, न साँप। हाथी तो बिल्कुल एक बड़े पंखे जैसा है!”
चौथा व्यक्ति – हाथी का पेट -चौथे व्यक्ति ने हाथी के विशाल शरीर को छुआ। उसने हाथ फैलाकर महसूस किया और बोला— “अरे, तुम सब गलत हो!”
वह बोला— “हाथी तो एक बहुत बड़ी दीवार जैसा है—विशाल, चौड़ा और मजबूत!”
पाँचवाँ व्यक्ति – हाथी का दाँत पाँचवें व्यक्ति के हाथ में हाथी का दाँत आया। उसने उसे छूकर कहा— “तुम सबकी बातें सुनकर मुझे हँसी आ रही है!
पाँचवाँ बोला— “क्योंकि हाथी न खंभा है, न साँप, न पंखा और न दीवार। हाथी तो बिल्कुल एक मजबूत भाले जैसा है—नुकीला और कठोर!”
छठा व्यक्ति – हाथी की पूँछ -अब छठे व्यक्ति ने हाथी की पूँछ पकड़ ली। वह बोला— “बस करो, तुम सब बेकार की बहस कर रहे हो!”
वह आत्मविश्वास से बोला— “हाथी तो बिल्कुल रस्सी जैसा है। मैंने स्वयं अपने हाथों से उसे पकड़ा है!”
अब छहों में भयंकर बहस शुरू हो गई। पहला: “हाथी खंभा है!” दूसरा: “नहीं, हाथी साँप है!” तीसरा: “तुम दोनों गलत हो, हाथी पंखा है!” चौथा: “नहीं! हाथी दीवार है!” पाँचवाँ: “हाथी भाला है!” छठा: “तुम सब गलत हो! हाथी रस्सी है!” धीरे-धीरे बहस झगड़े में बदल गई। हर व्यक्ति कह रहा था— “मैं सही हूँ!” “मैंने स्वयं अनुभव किया है!” “तुमने हाथी को ठीक से समझा ही नहीं!”
तभी वहाँ से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुजर रहा था। उसने उनकी बहस सुनी और मुस्कुराकर पूछा— “तुम लोग किस बात पर झगड़ रहे हो?”
छः अंधों ने एक साथ कहा— “हम हाथी के बारे में बात कर रहे हैं!”
बुद्धिमान व्यक्ति ने पूछा— “तो बताओ, हाथी कैसा है?”
सबने जो अपनी बुद्धि से समझा था बता दिया।
बुद्धिमान व्यक्ति कुछ क्षण शांत रहा।
फिर उसने कहा— “तुममें से कोई भी पूरी तरह गलत नहीं है… लेकिन तुममें से कोई भी पूरी तरह सही भी नहीं है।”
सब चौंक गए। उन्होंने पूछा— “यह कैसे संभव है?”
बुद्धिमान व्यक्ति बोला— “तुम सभी ने हाथी को छुआ है, लेकिन पूरे हाथी को नहीं। तुमने उसका केवल एक-एक अंग जाना है।”
फिर उसने समझाया— “जिसने पैर छुआ, उसे हाथी खंभे जैसा लगा,और बाकी सब को अलग अलग अंग छूने से अलग अलग अनुभव हुए।
फिर वह गंभीर होकर बोला— “तुम्हारी गलती अनुभव करने में नहीं थी… गलती यह थी कि तुम अपने अधूरे अनुभव को पूरा सत्य समझ बैठे।”
छः अंधे व्यक्ति शांत हो गए। अब उन्हें समझ में आ गया कि— कभी-कभी हम जो जानते हैं, वह गलत नहीं होता… लेकिन वह पूरा सत्य भी नहीं होता।
जिस प्रकार छह अंधे व्यक्तियों ने हाथी के एक-एक अंग को छूकर अपनी धारणा बना ली, उसी प्रकार हम भी सीमित बुद्धि और अनुभव से भगवान को समझने का प्रयास करते हैं।
शिक्षा - लेकिन भगवान अनंत और असीम हैं, जबकि हमारी बुद्धि सीमित है। हम उनके किसी एक गुण को समझकर सोचते हैं—“अब मैं भगवान को जान गया।” कोई उनकी शक्ति से प्रभावित होता है, कोई करुणा, सुंदरता या मधुरता से।
पर भगवान हमारी समझ से कहीं अधिक महान हैं।
इसलिए हमें गुरु की आवश्यकता होती है। जैसे हाथी को पूरी तरह जानने के लिए किसी जानकार व्यक्ति की आवश्यकता थी, वैसे ही आध्यात्मिक जीवन में हमें ऐसे गुरु चाहिए जो आत्मसाक्षात्कारी हो।
गुरु और शास्त्रों के मार्गदर्शन से हम भगवान की महानता, मधुरता, करुणा, सुंदरता और जन्म कर्म की दिव्यता को समझना शुरू करते हैं।
भक्ति हमें सिखाती है— भगवान को केवल बुद्धि से नहीं, कृपा से जाना जाता है।
उस कृपा के माध्यम हैं—गुरु, साधु और शास्त्र।
वास्तविक विनम्रता यह है— “मेरी बुद्धि सीमित है, भगवान असीम हैं। इसलिए मुझे उन महापुरुषों का आश्रय लेना चाहिए, जिन्होंने भगवान को जाना है।”
भगवत गीता में भगवान कहते हैं :-
"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥"
उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त करने के लिए तुम तत्त्वदर्शी गुरुजनों के पास जाओ।
उन्हें विनम्रतापूर्वक प्रणाम करके, जिज्ञासापूर्वक प्रश्न करके तथा उनकी सेवा करके प्रसन्न करो।
वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें वह ज्ञान प्रदान करेंगे, क्योंकि उन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है।
