एक माताजी थीं, जो बचपन से ही भगवान की भक्ति में लगी रहती थीं। उन्होंने कभी मांसाहार नहीं किया था, अंडा भी नहीं खाया था। लेकिन जब उनकी शादी हुई तो उनके पति मटन-चिकन सब खाते थे।
माताजी अपने मुँह पर कपड़े की पट्टी बाँधकर अपने पति के लिए मटन-चिकन सब बनाती थीं। वे उल्टियाँ भी करती थीं, क्योंकि उनसे वह बदबू बर्दाश्त नहीं होती थी। फिर स्नान करके भगवान के लिए भोग बनाती थीं और जगन्नाथ जी को भोग लगाती थीं और रोती रहती थीं कि, "मेरी मदद करो!"
एक दिन अचानक, जब उनके पति रात को सो रहे थे, तो उनको सपना आया कि समुद्र के किनारे एक मंदिर है, राधा रासबिहारी वहाँ मुझे बुला रहे हैं। (वे जीवन में कभी मंदिर नहीं गए थे।)
तो उन्होंने अपने भाई से पूछा, जो मुंबई में रहते थे, कि ऐसा कोई मंदिर है? उन्होंने बोला, "हाँ! राधा रासबिहारी का मंदिर है।" उन्होंने कहा, "मैं आना चाहता हूँ।" तो वे वहाँ मंदिर में गए और भगवान के दर्शन किए।
वहाँ पर राधा गोविंद महाराज की कक्षा चल रही थी और वे कक्षा में यही बता रहे थे कि मांसाहार नहीं करना चाहिए। वह कक्षा सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए। जैसे ही घर आए, आते ही अपनी पत्नी को दंडवत प्रणाम किया, "मुझे माफ कर दो, मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया।" फिर घर का सारा मांसाहार का सामान बाहर फेंक दिया। सारे खराब बर्तन भी बाहर फेंक दिए और इस्कॉन मंदिर से जुड़ गए। (१९९० की बात है।)
१९९४ में ब्राह्मण दीक्षा भी ले ली और आज २०/२२ साल से वृंदावन में दोनों सेवा कर रहे हैं। माताजी राधा श्यामसुंदर के वस्त्रों को धोने और आभूषण बनाने की सेवा करती हैं, रसोई बनाती हैं, और प्रभुजी गौशाला में गिरिराज जी की सेवा करते हैं। उनके कारण उनका पूरा परिवार आज भक्त बन गया है। जब हम भगवान के लिए सहन करते हैं, तो भगवान हमारे लिए चिंता करते हैं।

भगवद्गीता ९.२२ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
शिक्षा - जो भक्त अनन्य भाव से भगवान का चिंतन और भक्ति करते हैं, उनके योग (जो नहीं है उसे देना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा करना) का भार भगवान स्वयं उठाते हैं।
