एक मूर्तिकार था। वह एक विशाल और कठोर पत्थर को देखकर सोच रहा था— “इसी पत्थर से एक सुंदर मूर्ति बनाई जा सकती है। मुझे बस उसे बाहर निकालना है।” उसने अपना भारी हथौड़ा उठाया और पूरी शक्ति से पत्थर पर प्रहार किया। ठाक! पत्थर पर कोई असर नहीं हुआ। उसने दूसरा प्रहार किया। ठाक! फिर भी कुछ नहीं। तीसरा… चौथा… दसवाँ… लेकिन पत्थर वैसा का वैसा खड़ा था। मूर्तिकार लगातार प्रयास करता रहा—20, 50, 70, 90 प्रहार… उसका शरीर थक चुका था, माथे पर पसीना और हाथों में असहनीय दर्द था। लेकिन पत्थर पर एक छोटी-सी दरार तक नहीं आई थी। पास से गुजर रहा एक राहगीर हँसते हुए बोला— “अरे भाई! 99 बार मार चुके हो, पर एक निशान तक नहीं पड़ा। यह पत्थर तुम्हारी मेहनत से कहीं ज्यादा मजबूत है। इसे छोड़ दो, क्यों समय और शक्ति बर्बाद कर रहे हो?” मूर्तिकार ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने गहरी साँस ली, पसीना पोंछा और एक बार फिर हथौड़ा उठाया। यह उसका 100वाँ प्रहार था। उसने पूरी शक्ति से वार किया— ठाआआक!!! और देखते ही देखते पत्थर दो टुकड़ों में टूट गया! राहगीर हैरान होकर चिल्लाया— “अरे वाह! यह तो तुम्हारे आखिरी प्रहार का कमाल था!” मूर्तिकार मुस्कुराया और बोला— “नहीं मित्र, पत्थर केवल 100वें प्रहार से नहीं टूटा। पिछले 99 प्रहारों ने उसे अंदर से तोड़ा था। 100वाँ प्रहार तो केवल वह क्षण था, जब परिणाम दुनिया की आँखों के सामने आया।”
शिक्षा :
निरंतरता ही विजय है कई बार हम भी जीवन में लगातार मेहनत करते हैं—दिन, हफ्ते, महीने बीत जाते हैं, लेकिन कोई परिणाम नहीं दिखता। मन हार मानने लगता है कि शायद सब व्यर्थ जा रहा है। लेकिन याद रखिए, जब बाहर कोई बदलाव नहीं दिख रहा होता, तब भीतर की नींव तैयार हो रही होती है। हर छोटा प्रयास, हर विफलता और हर दिन का अनुशासन अंदर से पुरानी आदतों और कमजोरियों को तोड़ रहा होता है। जैसे सुप्रसिद्ध नीति-वचन है: "करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते, सिल पर पड़त निसान॥" पत्थर पर कुएं की कोमल रस्सी भी तभी निशान छोड़ती है, जब वह बिना रुके बार-बार घिसती है। हो सकता है आपका अगला कदम ही वह '100वाँ प्रहार' हो जो सब कुछ बदल दे। "Success is rarely the result of one big leap; it is the sum of countless quiet efforts that no one ever saw." "Trust the process and never give up."
