एक समय की बात है, एक गाँव में एक बूढ़ी अम्मा अकेली रहती थीं। उनके परिवार में कोई नहीं था, इसलिए वे बेहद अकेलापन महसूस करती थीं। अपने इस अकेलेपन को दूर करने के लिए, वे एक दिन बाजार गईं और वहाँ से एक अत्यंत सुंदर, हरे रंग का तोता और एक नक्काशीदार सोने का पिंजरा खरीद लाईं। बूढ़ी अम्मा उस तोते को घर ले आईं और पिंजरे को अपने घर की मुख्य खिड़की पर लटका दिया। समय के साथ, वे उस सोने के पिंजरे की सुंदरता से इतनी प्रभावित और आसक्त (Obsessed) हो गईं कि पिंजरे को सजाना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन गया। • पहला दिन: उन्होंने पिंजरे को साफ पानी से धोया और उसे तब तक चमकाया जब तक कि वह सूर्य की तरह चमकने नहीं लगा। • दूसरा दिन: उन्होंने पिंजरे की सलाखों पर कीमती मोतियों और चमकते हुए हीरों की मालाएं लटका दीं। • तीसरा दिन: उन्होंने पिंजरे के चारों ओर ताजे और सुगंधित मोगरे तथा गुलाब के फूलों के सुंदर गजरे बुने। • चौथा दिन: उन्होंने पिंजरे पर छोटी-छोटी चांदी की घंटियां लगा दीं, जो हवा चलने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न करती थीं। धीरे-धीरे पूरे गाँव में इस बात की चर्चा फैल गई कि अम्मा के पास एक अद्भुत और बेहद खूबसूरत पिंजरा है। लोग दूर-दूर से अम्मा के घर के बाहर लंबी लाइनें लगाकर उस पिंजरे को देखने आने लगे। अम्मा गर्व से फूली नहीं समाती थीं। पिंजरे को साफ करने, चमकाने और बाहरी रूप से सजाने में वे इतनी खो गईं कि वे एक सबसे बुनियादी बात भूल गईं—उन्होंने तोते को खाना खिलाने या पानी पिलाने के लिए पिंजरे का दरवाजा कभी खोला ही नहीं। सातवें दिन, जब वे हमेशा की तरह पिंजरे के सोने के तारों को पॉलिश कर रही थीं, तब उन्होंने देखा कि तोता कोई हलचल नहीं कर रहा था और न ही कोई आवाज निकाल रहा था। उन्होंने पिंजरे का दरवाजा खोला, हाथ अंदर डाला और तोते को छुआ। तोता मर चुका था। वह भूख और प्यास से तड़पकर दम तोड़ चुका था। बूढ़ी अम्मा फूट-फूट कर रोने लगीं और विलाप करते हुए बोलीं, "हाय! यह क्या अनर्थ हो गया! मैंने तुम्हारे घर को कितना सुंदर सजाया था, फिर भी तुम मुझे छोड़कर चले गए!" वहाँ से गुजर रहे ग्रामीणों ने जब यह देखा तो कहा, "अरे मूर्ख स्त्री! तुमने सारा समय पिंजरे को सजाने में गंवा दिया, लेकिन उसके भीतर रहने वाले जीव को भोजन देना ही भूल गई!"
हमारे लिए संदेश:-
1.पिंजरा हमारे भौतिक शरीर का प्रतीक है: यह सोने का पिंजरा हमारा स्थूल शरीर है (और साथ ही हमारी भौतिक संपत्ति, बैंक बैलेंस, मकान और गाड़ियां हैं)। आधुनिक समाज अपनी 100% ऊर्जा इसी "पिंजरे" को धोने, चमकाने, कपड़े पहनाने और सजाने में लगा रहा है। हम इसे महंगे ब्यूटी पार्लर ले जाते हैं, अच्छे कपड़े पहनाते हैं ताकि समाज (गाँव वाले) हमारी तारीफ करें। 2.तोता हमारी आत्मा का प्रतीक है: पिंजरे के भीतर बैठा पक्षी हमारी जीवात्मा है—जो वास्तव में जीवन का स्रोत है। आत्मा के बिना यह शरीर केवल एक मृत लाश (Corpse) है। 3.आत्मा की भूख (Starvation of the Soul): जिस प्रकार एक पक्षी सोना, मोती या फूल नहीं खा सकता, उसी प्रकार हमारी आत्मा को भौतिक भोजन, धन या इंद्रिय तृप्ति (Sensual Pleasures) से संतुष्टि नहीं मिल सकती। आत्मा का भोजन केवल आध्यात्मिक रस है—जैसे भगवान के पवित्र नामों का जप (हरे कृष्ण महामंत्र), दिव्य ज्ञान का श्रवण (भगवद्गीता) और भगवान की प्रेममयी सेवा। 4.मानव सभ्यता का संकट: श्रील प्रभुपाद कहते थे कि आधुनिक विश्वविद्यालय और सरकारें "पिंजरा साफ करने की तकनीक" (Cage-cleaning technology) में बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। वे शरीर को आराम देने के लिए बड़े-बड़े अस्पताल, आर्थिक प्रणालियाँ और मनोरंजन के साधन तो बना रहे हैं, लेकिन क्योंकि आत्मा भूखी है, इसलिए आज का इंसान अंदर से तनाव, चिंता और गहरे डिप्रेशन में जी रहा है।
पिंजरे की देखभाल जरूर कीजिए (शरीर को स्वस्थ और स्वच्छ रखिए), लेकिन पिंजरे के भीतर बैठे तोते (आत्मा) को भोजन देना कभी मत भूलिए। वास्तविक सुख केवल तभी मिल सकता है जब आत्मा भगवान श्री कृष्ण के साथ जुड़कर आध्यात्मिक रूप से पोषित होती है।
