एक समय की बात है, शहर का बड़ा खेल मैदान दर्शकों की भारी भीड़ से खचाखच भरा हुआ था।
हर तरफ उत्साह और शोर था, क्योंकि उस दिन 'स्पेशल ओलंपिक्स' की सबसे रोमांचक दौड़ होने वाली थी।
मैदान के ट्रैक पर नौ बच्चे खड़े थे, जो मानसिक और शारीरिक रूप से थोड़े अलग थे।
उन्होंने इस १०० मीटर की दौड़ के लिए महीनों तक कड़ी मेहनत की थी। हर एक बच्चे की आँखों में जीत का सपना और गले में मेडल पहनने की चाहत साफ चमक रही थी।
सभी बच्चे स्टार्टिंग लाइन पर अपनी-अपनी जगह पर तैयार हो की खड़े हो गए। पूरा स्टेडियम शांत हो गया और सबकी नजरें बच्चों पर टिक गईं।
जैसे ही रेफरी ने पिस्तौल से हवा में फायर किया, सभी बच्चे अपनी पूरी ताकत के साथ आगे की तरफ दौड़े।
तभी अचानक एक अप्रत्याशित घटना घटी। दौड़ शुरू होते ही सबसे छोटा बच्चा अपना संतुलन खो बैठा। वह लड़खड़ाया और ट्रैक पर घुटनों के बल गिर पड़ा।
गिरने की चोट से ज्यादा उसे इस बात का गहरा दुख हुआ कि उसकी महीनों की मेहनत बेकार चली गई। वह अपनी टूटी हुई उम्मीदों के साथ वहीं मैदान पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा।
दौड़ के उस माहौल में, जहाँ हर सेकंड मायने रखता था, एक अद्भुत बात हुई। रोते हुए बच्चे की आवाज सुनकर बाकी के आठ बच्चे फिनिशिंग लाइन की तरफ भागने के बजाय वहीं रुक गए।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा कि उनका एक साथी दर्द में तड़प रहा है। बिना एक पल गंवाए, वे सभी आठों बच्चे पीछे की तरफ दौड़ पड़े और उस गिरे हुए बच्चे के पास पहुँच गए।
उनमें से एक छोटी बच्ची ने नीचे झुककर उस रोते हुए बच्चे को गले से लगा लिया और प्यार से उसके आंसू पोंछे।
इसके बाद उन सभी नौ बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और एक लंबी कतार बना ली। अब वे दौड़ नहीं रहे थे, बल्कि एक-दूसरे का सहारा बनकर मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे फिनिशिंग लाइन की तरफ बढ़ने लगे।
जब वे नौ बच्चे एक साथ हाथ पकड़े हुए फिनिशिंग लाइन पर पहुंचे, तो पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उस दिन खेल अधिकारियों ने उन सभी नौ बच्चों के गले में सोने का मेडल पहनाया।
उस दिन जीत किसी एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि सहयोग (co-operation) और प्रेम की हुई थी।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण और श्रील प्रभुपाद की सीख:
यह सुंदर घटना हमें सीधे उस दिव्य सत्य की ओर ले जाती है जो अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कॉन) के संस्थापक-आचार्य श्रील प्रभुपाद ने हमें सिखाया है।
श्रील प्रभुपाद हमेशा कहते थे कि इस्कॉन एक वैश्विक परिवार है, जहाँ हम सभी भगवान कृष्ण के अंश के रूप में एक-दूसरे के भाई-बहन हैं।
इस भौतिक संसार के 'भव-बंधन' को पार करने की यह यात्रा भी इस १०० मीटर की रेस की तरह ही है। माया के इस प्रभाव में हम सभी जीव आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।
इस यात्रा में कोई साधक बहुत दृढ़ हो सकता है, तो कोई आध्यात्मिक रूप से थोड़ा कमजोर हो सकता है या माया के प्रभाव में आकर मार्ग में गिर सकता है।
जब हम आपस में ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा को छोड़कर, प्रेमपूर्वक एक-दूसरे का सहयोग (co-operate) करते हैं, तभी यह 'कृष्ण भावनामृत आंदोलन' (Krishna Consciousness Movement) तीव्र गति से आगे बढ़ सकता है।।
जब हम मिलकर संकीर्तन करते हैं और एक-दूसरे की भक्ति में मदद करते हैं, तो कोई भी पीछे नहीं छूटता।
इस दिव्य सहयोग से हम सभी एक साथ इस भौतिक जगत के दुखों और भव-बंधन को पार करके, भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों में स्थान पाकर 'परम मेडल' यानी गोलोक वृंदावन की प्राप्ति कर सकते हैं। जहाँ सब जीत जाते हैं और हारता कोई नहीं।
श्रीमद्भागवतम (४.३०.८) — प्रचेता गणों का प्रसंग
श्री-भगवानुवाच
वरं वृणीध्वं भद्रं वो यूयं मे नृपनन्दनाः ।सौहार्देनापृथग्धर्मास्तुष्टोऽहं सौहृदेन वः ॥
सर्वोच्च भगवान (श्री कृष्ण) ने कहा: हे राजा के पुत्रों (प्रचेताओं)! मैं आप सभी के बीच के मैत्रीपूर्ण संबंधों और आपसी सहयोग से अत्यंत प्रसन्न हूँ।
आप सभी एक ही कर्तव्य — मेरी भक्ति सेवा में एकजुट होकर लगे हुए हैं। आपके इस आपसी सौहार्द से संतुष्ट होकर मैं आपको अपनी शुभकामनाएं देता हूँ। अब आप मुझसे कोई भी वरदान मांग सकते हैं।
श्रील प्रभुपाद ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में कहा था:
"Your love for me will be shown by how much you co operate to keep this institution together." (मेरे प्रति आपका प्रेम इस बात से दिखेगा कि आप इस संस्था को एकजुट रखने के लिए कितना सहयोग करते हैं)।
शिक्षा - श्रील प्रभुपाद हमें सिखाते हैं कि एक आध्यात्मिक परिवार के रूप में हमारा यह कर्तव्य नहीं है कि हम कमजोर को पीछे छोड़कर अकेले भगवद्धाम जाने की होड़ में लग जाएं। असली भक्ति और वैष्णव कृपा इसमें है कि यदि कोई भक्त मार्ग में लड़खड़ाए, तो हम रुकें, उसे संभालें और उसका हाथ थामकर आगे बढ़ाएं।

