International Society for Krishna Consciousness

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बीरबल का न्याय — कुआँ बेचा या पानी?
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बीरबल का न्याय — कुआँ बेचा या पानी?

एक गाँव में दो पड़ोसी रहते थे।

भाषा:

एक गाँव में दो पड़ोसी रहते थे।

एक किसान था—सीधा-सादा, मेहनती और ईमानदार।

दूसरा व्यक्ति थोड़ा चालाक स्वभाव का था।

किसान के खेत में पानी की बहुत समस्या थी। उसने सोचा— “अगर मेरे खेत के पास अपना कुआँ हो जाए, तो खेती करना कितना आसान हो जाएगा!”

उसे पता चला कि उसके पड़ोसी के पास एक कुआँ है और वह उसे बेचने को तैयार है।

किसान उसके पास गया। “भाई, सुना है तुम अपना कुआँ बेचना चाहते हो?”

पड़ोसी: “हाँ, अगर तुम्हें खरीदना हो तो खरीद लो।”

दोनों के बीच बात तय हुई। उचित मूल्य दिया गया और कुआँ किसान का हो गया। किसान बहुत प्रसन्न था।

उसने सोचा— “अब मेरे खेतों की सिंचाई की समस्या समाप्त हो जाएगी।”

अगले दिन... सुबह किसान बाल्टी लेकर कुएँ के पास पहुँचा। जैसे ही वह पानी निकालने लगा, उसका पड़ोसी दौड़ता हुआ आया।

पड़ोसी बोले - “रुको! यह क्या कर रहे हो?”

किसान आश्चर्य से बोला— “क्या हुआ? यह कुआँ मैंने तुमसे खरीदा है। अपने खेत के लिए पानी ले रहा हूँ।”

पड़ोसी मुस्कुराया और बोला— “कुआँ खरीदा है... पानी नहीं!”

किसान चौंक गया। “क्या मतलब? कुआँ खरीदा है तो उसमें का पानी भी तो मेरा ही हुआ!”

पड़ोसी चालाकी से बोला— “नहीं! मैंने तुम्हें केवल कुआँ बेचा है। उसके अंदर का पानी नहीं बेचा। पानी मेरा है। अगर पानी चाहिए तो उसके अलग से पैसे देने पड़ेंगे।”

बेचारा किसान बहुत परेशान हो गया।

अकबर के दरबार में न्याय की आशा लेकर किसान बादशाह अकबर के दरबार में पहुँचा। उसने पूरी बात सुनाई।

“जहाँपनाह! मैंने अपने पड़ोसी से कुआँ खरीदा है। अब वह कहता है कि कुआँ मेरा है लेकिन पानी उसका है। मुझे न्याय चाहिए।”

अकबर ने पड़ोसी को दरबार में बुलवाया। फिर उन्होंने बीरबल की ओर देखा। “बीरबल, यह बड़ा विचित्र मामला है। तुम ही इसका न्याय करो।”

बीरबल ने शांत भाव से दोनों की बात सुनी। फिर पड़ोसी की ओर देखकर पूछा— “क्या यह बात सच है कि तुमने किसान को केवल कुआँ बेचा है, लेकिन पानी नहीं?”

पड़ोसी बड़े गर्व से बोला— “जी हाँ! बिल्कुल सच है। कुआँ किसान का है, लेकिन पानी मेरा है।”

बीरबल मुस्कुराए। कुछ क्षण चुप रहे... फिर बोले— “बहुत अच्छा! यदि कुआँ किसान का है और पानी तुम्हारा है, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारा पानी किसान की संपत्ति में रखा हुआ है।”

पड़ोसी थोड़ा घबराया। “जी...?”

बीरबल ने आगे कहा— “तो अब तुम्हारे पास दो विकल्प हैं।”

पूरा दरबार ध्यान से सुनने लगा। “पहला—तुम अपना सारा पानी तुरंत इस किसान के कुएँ से बाहर निकाल लो।”

पड़ोसी का चेहरा उतर गया।

बीरबल ने दूसरा विकल्प बताया— “और दूसरा—यदि तुम्हारा पानी इसी किसान के कुएँ में रखना है, तो तुम्हें किसान को उसके कुएँ को इस्तेमाल करने का किराया देना होगा।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। पड़ोसी समझ गया कि उसकी चालाकी उसी पर भारी पड़ गई है। उसने सिर झुका लिया। “मुझे क्षमा कर दीजिए। मैंने लालच और चालाकी में आकर गलत बात कही।

कुआँ और पानी दोनों किसान के हैं। मैं अब कभी उसे नहीं रोकूँगा।”

अकबर मुस्कुराए और बोले— “बीरबल, तुम्हारी बुद्धि सचमुच अद्भुत है!” और किसान को न्याय मिल गया।

बुद्धि का उपयोग यदि सेवा, सत्य और धर्म के लिए हो तो वह विवेक है। लेकिन वही बुद्धि यदि छल, कपट और स्वार्थ के लिए हो तो वह कुटिलता बन जाती है।

वह कह रहा था— “कुआँ तुम्हारा है, लेकिन पानी मेरा है।” यही समस्या हमारे जीवन में भी है।

हम भी अक्सर भगवान की दी हुई वस्तुओं पर अपना अधिकार जताने लगते हैं— मेरा घर, मेरा धन, मेरा परिवार, मेरी संपत्ति, मेरी सफलता... लेकिन वास्तव में क्या यह सब हमारा है?

ईशोपनिषद का प्रथम मंत्र कहता है—

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"

इस जगत में जो कुछ भी है—चल या अचल—सब भगवान के स्वामित्व में है। इसलिए मनुष्य को भगवान द्वारा अपने लिए निर्धारित हिस्से को स्वीकार करते हुए उसका उपयोग करना चाहिए और किसी अन्य की वस्तु पर लालच नहीं करना चाहिए।

शिक्षा - यही इस कहानी का सबसे सुंदर संदेश है। पड़ोसी ने कुआँ बेच दिया था। अब कुआँ किसान का हो चुका था। लेकिन फिर भी वह पानी पर अधिकार जताकर ऐसी वस्तु से लाभ लेना चाहता था, जिस पर उसका अधिकार नहीं रह गया था। इसी प्रकार हम भी जीवन में कई बार अपने हिस्से से अधिक पर अधिकार जताने लगते हैं।

भगवान ने हमें इस संसार में आवश्यक वस्तुएँ दी हैं, उनका उपयोग करने का अधिकार दिया है, लेकिन अनावश्यक संग्रह, लालच और दूसरे के हिस्से पर अधिकार जमाने का अधिकार नहीं दिया।

इसलिए ईशोपनिषद हमें तीन बातें सिखाता है:

१ वास्तविक मालिक भगवान हैं। हम किसी वस्तु के परम मालिक नहीं हैं।

2.हमें भगवान द्वारा दिए गए अपने हिस्से में संतुष्ट रहना चाहिए। जितनी आवश्यकता है, उतना ग्रहण करें।

3 दूसरे के अधिकार और हिस्से पर लालच नहीं करना चाहिए। यही “मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” का संदेश है।

“Possession may be in our hands, but ownership belongs to God.”

हरे कृष्ण
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