एक समय की बात है। एक बहुत बड़ा राजा था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी। विशाल महल, सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात, सेवक, सैनिक—किसी भी भौतिक सुविधा की उसके जीवन में कमी नहीं थी। लेकिन राजा की एक समस्या थी। उसे आध्यात्मिक विषयों में बिल्कुल रुचि नहीं थी। उसी राज्य में एक संत रहते थे। वे बड़े ज्ञानी और आत्मसाक्षात्कारी थे। वे अक्सर सोचते— “इस राजा के पास संसार की सारी सुविधाएँ हैं, लेकिन यदि इसे जीवन का वास्तविक उद्देश्य ही नहीं पता, तो इसका यह सारा वैभव किस काम का?” एक दिन संत राजा के महल में पहुँचे। राजा ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया। राजा: “आइए महाराज! आपका हमारे महल में स्वागत है।” संत बैठ गए। उन्होंने राजा से आध्यात्मिक विषयों पर कुछ बातें करने का प्रयास किया— संत: “महाराज, क्या आपने कभी सोचा है कि यह जीवन हमें क्यों मिला है? मृत्यु के बाद क्या होता है? हम कौन है? भगवान कौन हैं?” राजा को इन बातों में कोई रुचि नहीं थी। वह इधर-उधर देखने लगा। संत समझ गए— “सीधे उपदेश देने से यह राजा सुनने वाला नहीं है। इसे किसी और तरीके से समझाना होगा।” कुछ देर बाद संत मुस्कुराए और बोले— “महाराज, मेरे पास आपके लिए एक अच्छी खबर है और एक बुरी खबर है।” राजा तुरंत उत्सुक हो गया। राजा: “अच्छी खबर क्या है?” संत बोले— “महाराज, मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग की प्राप्ति होगी।” राजा बहुत प्रसन्न हो गया। उसका चेहरा खुशी से चमक उठा। राजा: “सच महाराज? यह तो बहुत अच्छी खबर है!” संत बोले— “हाँ महाराज, लेकिन एक बुरी खबर भी है।” राजा थोड़ा चिंतित हुआ। राजा: “बुरी खबर? वह क्या है?” संत ने कहा— “स्वर्ग में बहुत सारे मच्छर हैं।” राजा का चेहरा उतर गया। राजा: “क्या? स्वर्ग में इतने मच्छर! फिर तो वहाँ आराम से रहना बहुत कठिन होगा!” संत मुस्कुराए— “लेकिन महाराज, एक अच्छी खबर भी है।” राजा तुरंत उत्सुक हुआ। राजा: “अच्छी खबर? जल्दी बताइए!” संत बोले— “वहाँ मच्छरदानी भी है।” राजा ने राहत की साँस ली। राजा: “अच्छा! फिर तो कोई समस्या ही नहीं है।” लेकिन संत तुरंत बोले— “महाराज, एक बुरी खबर भी है।” राजा फिर चिंतित हो गया। राजा: “अब क्या हुआ?” संत बोले— “उस मच्छरदानी में बहुत सारे छेद हैं।” राजा फिर उदास हो गया। राजा: “अरे! फिर तो मच्छर अंदर आ जाएँगे। इसका क्या उपाय है?” संत बोले— “चिंता मत कीजिए महाराज। एक अच्छी खबर है।” राजा ने पूछा— “अब क्या अच्छी खबर है?” संत बोले— “उन छेदों को सुई से सिल सकते हैं।” राजा फिर प्रसन्न हो गया। राजा: “वाह! फिर तो समस्या का समाधान हो गया!” संत कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले— “लेकिन महाराज, एक बुरी खबर अभी बाकी है।” राजा ने घबराकर पूछा— “अब क्या हुआ?” संत बोले— “स्वर्ग में सुई नहीं है।” राजा चौंक गया। राजा: “क्या? स्वर्ग में सुई नहीं है?” संत बोले— “हाँ महाराज। इसलिए आपको सुई यहाँ से अपने साथ लेकर जानी पड़ेगी।” राजा हँस पड़ा। राजा: “महाराज, आप कैसी बात कर रहे हैं? मृत्यु के बाद कोई व्यक्ति इस संसार से अपने साथ कोई वस्तु लेकर नहीं जा सकता!” संत गंभीर हो गए। उन्होंने कहा— “महाराज… मैं आपको यही तो समझाना चाहता था।” राजा शांत हो गया। संत बोले— “जब आप इस संसार से एक छोटी-सी सुई भी अपने साथ नहीं ले जा सकते, तो फिर यह अपार धन-संपत्ति, महल, राज्य, सोना, चाँदी और ऐश्वर्य—इनमें से आप अपने साथ क्या लेकर जाएँगे?” राजा चुप था। संत ने आगे कहा— “जिस धन को इकट्ठा करने में आप अपना पूरा जीवन लगा रहे हैं, उसे एक दिन यहीं छोड़कर जाना पड़ेगा।” “जिस महल पर आपको गर्व है, वह यहीं रह जाएगा।” “यह शरीर भी यहीं रह जाएगा।” फिर संत ने राजा की आँखों में देखते हुए कहा— “महाराज, जब सब कुछ यहीं छोड़कर जाना है, तो आपने कभी यह जानने की जिज्ञासा क्यों नहीं की कि आपके साथ वास्तव में क्या जाएगा?” राजा ध्यान से सुनने लगा। संत बोले— “आपने धन कमाने में रुचि ली।” “राज्य बढ़ाने में रुचि ली।” “ऐश्वर्य बढ़ाने में रुचि ली।” “लेकिन क्या आपने कभी अपनी आत्मा की उन्नति के बारे में गंभीरता से सोचा?” “क्या आपने कभी जानने की कोशिश की कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?” राजा की आँखें नीचे झुक गईं। संत बोले— “महाराज, जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल धन इकट्ठा करना नहीं है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य है—भगवान को जानना और उन्हें प्राप्त करना।” “यह संसार अस्थायी है। यहाँ की हर वस्तु एक दिन छूट जाएगी।” “लेकिन आत्मा शाश्वत है।” “और भगवान के साथ हमारा संबंध भी शाश्वत है।” फिर संत ने कहा— “इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल उस चीजों को कमाने में जीवन नहीं लगाता जो मृत्यु के साथ छूट जाए। वह उस उपलब्धि के लिए प्रयास करता है जो मृत्यु के बाद भी उसके साथ रहे।” राजा अब पूरी तरह शांत था। संत ने प्रेमपूर्वक कहा— “महाराज, धन कमाइए, अपने कर्तव्य निभाइए, राज्य चलाइए—लेकिन जीवन के वास्तविक उद्देश्य को मत भूलिए।” “इस मानव जीवन का उपयोग आत्मा की उन्नति और भगवद्प्राप्ति के लिए कीजिए।”
शिक्षा -“जिस चीज़ को हमें एक दिन छोड़कर जाना है, उसके लिए हम कितना समय दे रहे हैं? और जो वास्तव में हमारे साथ जाएगा, उसके लिए हम कितना प्रयास कर रहे हैं?” हम जीवनभर धन, पद, प्रतिष्ठा और सुविधाओं को इकट्ठा करने में लगे रहते हैं। लेकिन मृत्यु के समय— न महल साथ जाएगा, न धन,न पद ,न शरीर साथ जाएगा। फिर क्या साथ जाएगा? हमारे कर्म, हमारी चेतना और हमारी आध्यात्मिक उन्नति। इसीलिए शास्त्र हमें केवल यह नहीं सिखाते कि संसार में कैसे सफल बनें। वे हमें यह सिखाते हैं कि— “इस जीवन को सफल कैसे बनाना है।” और जीवन की वास्तविक सफलता है— आत्मा को पहचानना, भगवान को जानना और भगवद्प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ना।
